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अटल बिहारी वाजपेयी के ‘हनुमान’, जिन पर लगा आतंकियों को छोड़ने का दाग, विद्रोही राजनेता की अनकही दास्तां


भारतीय राजनीति के दिग्गज और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संस्थापक नेताओं में से एक जसवंत सिंह का नाम आज भी अत्यंत आदर और सम्मान से लिया जाता है। सेना में मेजर के पद से लेकर देश के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों—विदेश, रक्षा और वित्त—की कमान संभालने तक, उनका राजनीतिक सफर बेजोड़ रहा, लेकिन कई विवाद भी उनसे जुड़े रहे।
भारतीय राजनीति के दिग्गज और भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक नेताओं में से एक जसवंत सिंह का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। सेना के मेजर से लेकर विदेश, रक्षा और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की कमान संभालने वाले इस राजनेता ने अपनी बेबाकी और सिद्धांतों से देश की कूटनीति और राजनीति को नई दिशा दी। वाजपेयी के ‘हनुमान’ कहलाने वाले जसवंत सिंह का जीवन साहस, स्वाभिमान और विद्रोह की अनूठी गाथा है।
जसवंत सिंह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ राजनेता रहे, जिन्हें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपना ‘हनुमान’ कहते थे। आज भी वो अपनी नम्रता, नैतिकता और बेबाकी के लिए याद किए जाते हैं। जसवंत सिंह उन दुर्लभ नेताओं में से थे, जिन्हें भारत के रक्षा, वित्त और विदेश मंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ। उनका जीवन सफलताओं की ऊंचाइयों से विद्रोह की गहराइयों तक का रहा।
3 जनवरी 1938 को राजस्थान के बाड़मेर जिले के छोटे से गांव जसोल में राजपूत परिवार में पले-बढ़े जसवंत सिंह ने बचपन से ही अनुशासन और देशभक्ति की सीख ली। शिक्षा पूरी करने के बाद वे भारतीय सेना में शामिल हो गए। आर्टिलरी रेजिमेंट में मेजर के पद तक पहुंचे। 1960 के दशक में सेना से इस्तीफा देकर राजनीति में कदम रखा। शुरुआती दिनों में वे जनसंघ से जुड़े, जो बाद में भाजपा बनी।
1980 में राज्यसभा सदस्य चुने गए, जो उनके लंबे संसदीय सफर की शुरुआत थी। 1991 से 2014 तक वे पांच बार लोकसभा सदस्य रहे। राजस्थान की रेतीली धरती से दिल्ली के तख्त तक का यह सफर उनकी मेहनत का प्रतीक था।