
बांग्लादेश में तारिक रहमान की अगुवाई में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार बनने का रास्ता साफ हो चुका है। बांग्लादेश में सबसे ज्यादा वर्षों तक सत्ता में रही अवामी लीग के बगैर हुए चुनावों में शेख हसीना की पार्टी के दोनों कट्टर विरोधी दलों (बीएनपी गठबंधन और जमात-ए-इस्लामी गठबंधन)ने जातीय संसद पर करीब-करीब पूरा कब्जा कर लिया है। बीएनपी गठबंधन ने तो दो-तिहाई बहुमत से भी ज्यादा का आंकड़ा पाया है। ऐसे में पिछली यादों को देखते हुए भारत के लिए यह चिंता की बात है कि उसके सामने आगे किस तरह की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। पिछली बार बीएनपी और जमात की गठबंधन सरकार के दौरान बांग्लादेश असम के उल्फा समेत पूर्वोत्तर के कई अलगाववादी संगठनों का पनाहगार बन गया था।
बीएनपी की पिछली सरकार ने क्या किया – पिछली बार जब बांग्लादेश में तारिक रहमान की अम्मी खालिदा जिया की सरकार थी तो खासकर 2001 से 2006 के बीच उन्होंने भारत के साथ सहज रिश्ते कायम करने की कोशिश नहीं की। इस दौरान बीएनपी पर उल्फा को संरक्षण देने के भी आरोप लगे। उल्फा को बीएनपी सरकार ने हथियारों की तस्करी की खुली छूट दी। 2004 में चटगांव से हथियारों की जब्ती इसका कुख्यात उदाहरण है।
भारतीय उग्रवादी संगठन बांग्लादेश से कब भागे – तथ्य यह है कि उल्फा ने 90 के दशक से ही बांग्लादेश के ढाका, सतचेरी और शेरपुर में अपने कैंप बना लिए थे और इसने बीएनपी के साथ-साथ अवामी लीग के भी कुछ नेताओं से साठगांठ करने की कोशिश की। परंतु जब 2009 में शेख हसीना की अवामी लीग सत्ता में पूरे दम के साथ बैठी तो उसने भारत-विरोधी अलगाववादी संगठनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। ज्यादातर उग्रवादी या तो वहां से भाग खड़े हुए या उन्हें पकड़ कर भारत के हवाले कर दिया गया।
बांग्लादेश लौटने के बाद तारिक रहमान का रवैया – 2006 में अपना पहला संसदीय चुनाव लड़ने से रोक दिए गए तारिक रहमान पिछले साल दिसंबर में ही अपने खुद के निर्वासन वाला जीवन छोड़कर लंदन से ढाका लौटे हैं। उन्होंने अपने आने के बाद से जितने भी भाषण दिए हैं, उससे यह लग रहा है कि वे खुद को बांग्लादेश की जमीन के साथ फिर से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। वे अपने पहले भाषणों से ही आंतरिक सौहार्द का संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें कुछ तो अवामी लीग को लेकर भी है। मतलब, उन्होंने टकराव की जगह चर्चा के रुख की ओर इशारा किया है।
बीएनपी की सोच में पहले से कितना अंतर – बात अब भारत की आंतरिक सुरक्षा और भारत के अलगाववादियों को लेकर उनकी सोच क्या हो सकती है,इस पर करते हैं। जब बीएनपी की पिछली सरकार सत्ता में थी, तो पाकिस्तान समर्थक कट्टरपंथी जमात ए इस्लामी भी उसी का हिस्सा थी। भारत-विरोधी यह पार्टी बांग्लादेश में पाकिस्तान की परछाई है, जो मुक्ति आंदोलन की विरोधी रही है। वहीं तारिक रहमान अब खुद को 1971 के आंदोलन का जोरदार पैरोकार साबित करने की कोशिशों में भी जुटे हुए दिखे हैं। सीधे शब्दों में कहें तो बीएनपी की सोच दो दशक पहले वाली नहीं लग रही।
तारिक का भारतीय उग्रवादियों को लेकर रवैया – 2002 में एक रिपोर्ट आई थी। तब यह चर्चा थी कि उल्फा जैसे भारत-विरोधी संगठनों को संरक्षण देने के मामले में बीएनपी के अंदर ही भारी विवाद शुरू हो गया है। यह सुनकर उल्फा जैसे उग्रवादी संगठनों के पैरों के नीचे की जमीन खिसने लगी थी। चर्चा थी कि तारिक रहमान ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादी संगठनों को उनकी सरकार क्यों संरक्षण दे रही है। यह वो समय था, जब खालिदा बेटे को राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर बढ़ाने लगी थीं। दूसरी तरफ भारत-विरोधी गतिविधियों के पीछे तारिक के पाकिस्तान समर्थक मामा सईद एस्कंदर का हाथ बताया जाता था। एस्कंदर भी अब दुनिया में नहीं हैं।
किस तरह का रिश्ता चाहेंगे तारिक रहमान – यही नहीं, बीएनपी में बढ़ते कद के साथ तारिक रहमान के लिए यह भी माना जाने लगा था कि वह भारत के साथ अच्छे संबंधों की वकालत करते थे। क्योंकि उन्हें लगता था कि दोनों देशों में दोस्ती ही उनके मुल्क की अर्थव्यस्था मजूबत कर सकती है। उनका मानना था कि दोनों देशों में उस समय जो रिश्तों में दूरी आई थी, उसके पीछे भारतीय अलगाववादी ही थे। ऐसे में तारिक रहमान का ऐतिहासिक बैकग्राउंड और उनका नया नजरिया तो इसी बात की ओर संकेत देता है कि वह अपनी अम्मी और मामा वाली सरकार की गलतियों को नहीं दोहराना चाहेंगे। चुनाव नतीजों के बाद दोनों देशों के औपचारिक संदेशों से भी यही भाव पैदा हुई है।
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