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चाबहार पोर्ट ‘सहयोग का शक्तिशाली प्रतीक’, अमेरिका से तनाव के बीच ईरान ने भारत को दिया क्या संकेत


भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फथाली ने अमेरिका से जारी तनाव के बीच चाबहार बंदरगाह प्रोजेक्ट को भारत-ईरान के सहयोग का एक शक्तिशाली प्रतीक बताया है। ईरान ने भारत के सहयोग से तैयार हो रहे इस प्रोजेक्ट को रीजनल कनेक्टिविटी और पारस्परिक विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना है। दरअसल, इस समय ईरान और अमेरिका के बीच भारी तनाव की स्थिति बनी हुई है और इसके चलते चाबहार बंदरगाह प्रोजेक्ट का भविष्य भी अधड़ में लटका हुआ है, जिसमें भारत ने भी बहुत कुछ दांव पर लगा रखा है।
ईरान ने भारत से रिश्तों की तारीफ की – ईरान के नेशनल डे के मौके पर ईरानी दूतावास में आयोजित एक रिसेप्शन कार्यक्रम में ईरान के भारत में राजदूत मोहम्मद फथाली ने दोनों देशों के हजारों वर्ष प्राचीन इतिहास, संस्कृति और सभ्यता का जिक्र करते हुए यह बताने की कोशिश की कि यह संबंध कुछ दशकों (75 साल) के राजनयिक रिश्तों से कहीं ज्यादा प्राचीन और मजबूत है। इस मौके पर भारत की ओर से ईरानी जनता को शुभकामनाएं देने के लिए विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज उपस्थित थे, जिन्होंने भारत-ईरान के गहरे द्विपक्षीय संबंधों के प्रति भारतीय प्रतिबद्धता की पुष्टि की।
‘ चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट सहयोग का प्रतीक’ – सोमवार को ईरानी दूतावास में आयोजित कार्यक्रम में ईरान के राजदूत मोहम्मद फथाली ने कहा कि ‘चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट हम दोनों देशों के बीच सहयोग का प्रतीक है, जो कि समान्य विकास और रीजनल कनेक्टिवी में महत्वपूर्ण रोल निभाता है।’ इस मौके पर सिबी जॉर्ज ने चीफ गेस्ट के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व किया। बाद में विदेश मंत्रालय ने एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि उन्होंने ईरान की सरकार और वहां के लोगों को भारत की ओर से शुभकामनाएं पहुंचाईं और द्विपक्षीय संबंधों को लेकर भारत की प्रतिबद्धता भी जाहिर की।
चाबहार पोर्ट को लेकर बढ़ गई उम्मीद – दरअसल, चाबहार पोर्ट में भारत का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। पिछले शुक्रवार (6 फरवरी, 2026) ही केंद्र सरकार ने संसद में बताया है कि अप्रैल, 2026 में समाप्त हो रही अमेरिकी पाबंदी से रियायत से पहले ही चाबहार पोर्ट के लिए 120 अरब डॉलर की अपने वादे के अनुसार भारत अपना योगदान पूरा कर चुका है। यह पैसे बंदरगाह के लिए उपकरणों की खरीद के लिए दिए गए हैं। हालांकि, 2026-27 के बजट में इसके लिए आवंटन नहीं होने से यह सवाल उठे हैं कि क्या अगर अमेरिका ने पाबंदी में छूट को आगे नहीं बढ़ाया तो भारत के लिए इसका संचालन मुश्किल होगा? वैसे अमेरिका की ओर से टैरिफ को लेकर हृदय परिवर्तन की वजह से यह उम्मीद जगी है कि डोनाल्ड ट्रंप चाबहार पोर्ट में भी भारत की राह में कांटे नहीं बिछाएंगे।
भारत के लिए रणनीतिक है चाबहार पोर्ट – भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट विकसित करने का प्रस्ताव 2003 में दिया था। इसके माध्यम से भारत को चारों तरफ से जमीन से घिरे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक इंटरनेशनल नॉर्थ-साऊथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के जरिए रोड और रेल कनेक्टिविटी का विकल्प मिल रहा था। इससे पाकिस्तान में घुसने से छुटकारा मिल जाता है। इस प्रोजेक्ट में शुरू में ही बहुत देरी हो गई, क्योंकि ईरान के संदिग्ध परमाणु कार्यक्रम के चलते अमेरिका ने उसपर प्रतिबंध लगा रखे थे।
अफगानिस्तान, मध्य एशिया के लिए अहम – बाद में इस बंदरगाह के संचालन के लिए इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) और ईरान के पोर्ट एंड मैरीटाइम ऑर्गेनाजेशन के बीच एक लंबी अवधि का समझौता हुआ। इस करार ने 2016 के शुरुआती समझौते की जगह ली, जिसमें भारत की भूमिका शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल तक थी और इसे हर साल बढ़ाया जाना था। हाल के वर्षों में भारत ने चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय खेपे भेजने के लिए किया गाय है। इनमें 2023 में अफगानिस्तान के लिए 20,000 टन गेहूं की सहायता भेजना और 2021 में ईरान में पर्यावरण-अनुकूल कीटनाशक पहुंचाना भी शामिल है।