
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विजयदशमी संबोधन में एक समाज, एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र के रूप में एकजुटता पर जोर दिया। उन्होंने गुंडागर्दी, हिंसा और कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति को गलत बताया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल पूरे होने पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विजयदशमी संबोधन पर कई बातें कहीं। इस दौरान उन्होंने कहा कि एक समाज, एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र के रूप में हम एकजुट हैं। हमें याद रखना चाहिए कि यह बड़ी पहचान हमारे लिए हर चीज से ऊपर है। इस वजह से, समाज में एक-दूसरे के प्रति हमारा रवैया सामंजस्यपूर्ण और सम्मानजनक होना चाहिए। हर किसी की अपनी मान्यताएं, प्रतीक और पूजा स्थल हैं। हमें सावधान रहना चाहिए कि हम विचार, शब्द या कर्म से इनका अनादर न करें।
गुंडागर्दी, हिंसा करना ठीक नहीं – उन्होंने आगे कहा कि नियम पालन, व्यवस्था पालन करना और सद्भाव पूर्व व्यवहार करना, ये अपना स्वभाव बनाना चाहिए। छोटी-बड़ी बातों पर या केवल मन में संदेश है इसलिए, कानून हाथ में लेकर रास्तों पर निकल आना, गुंडागर्दी, हिंसा करना। ये प्रवृत्ति ठीक नहीं। मन में प्रकृति रक्षक या समुदाय विशेष को अपना शक्ति प्रदर्शन करना ऐसी घाटनाएं योजनापूर्व की जाती हैं।
जाति की विविधता न बने विभाजन का कारण – संघ प्रमुख ने आगे कहा कि शासन-प्रशासन अपना काम बिना पक्ष के तथा बिना किसी दबाव में आए, नियम के अनुरूप करें। परन्तु समाज की सज्जन शक्ति और तरूण पीढ़ी को भी सजग और संगत होना पड़ेगा। भारत के व्यापक सांस्कृतिक लोकाचार के भीतर एकता पर जोर देते हुए भागवत ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर के वर्णित ‘अंतर्निहित सांस्कृतिक एकता’ के विचार पर प्रकाश डाला और कहा कि भाषा, आस्था, जीवनशैली और जाति की विविधता कभी भी विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए। उन्होंने पारस्परिक आचरण में जागरूकता और संयम का आह्वान किया।
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