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प्राचीन चीन में भी होती थी भगवान शिव की पूजा


शैव पंथ में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों- रुद्र, महेश, नटराज, पशुपति आदि की आराधना की जाती है और इसकी मूल जन्मभूमि भारत ही है। ऋग्वैदिक रुद्र की अवधारणा और सरस्वती-सिंधु सभ्यता के पुरास्थलों से प्राप्त शिवलिंग इस परंपरा की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं। किंतु शिव उपासना केवल भारत तक सीमित नहीं रही। समय के साथ इसका प्रसार एशिया के विस्तृत भूभाग में हुआ। उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, चीन, इंडोनेशिया, वियतनाम, म्यांमार और श्रीलंका जैसे देशों में इसके पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैं।
चौथी से आठवीं शताब्दी के मध्य अमू दरिया और सीर दरिया के बीच विकसित सोगदीयन संस्कृति के नगर पंजाकैंट से मिट्टी की दीवार पर अंकित शिव का चित्र मिला है। इसमें शिव यज्ञोपवीत धारण किए, बाघ की खाल ओढ़े और हाथ में त्रिशूल लिए हैं। यह संकेत है कि समाज में शिव आराधना का प्रभाव था। चीन के जीउक्वान की शिला गुफाओं में भी शिव का चित्रण मिलता है। एक गुफा में शिव को- कार्तिकेय और गणेश के साथ दिखाया गया है। प्राचीन चीन में भी शिव पूजा की जाती थी।
इंडोनेशिया में चौथी शताब्दी से ही शिव पूजा होने लगी थी। आठवीं से दसवीं शताब्दी तक शासन करने वाले मातरम राजवंश ने शिव को अपना प्रधान आराध्य माना और ‘गिरिन्द्र’ उपाधि धारण की, जिसका संबंध पर्वतों के देवता शिव से है। जावा का प्रसिद्ध प्रंबानन मंदिर, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है, शिव को समर्पित है। इस मंदिर में नटराज सहित विविध रूपों का अंकन है। वियतनाम के चंपा राज्य में शैव पंथ अत्यंत प्रभावशाली था और वहां त्रिभागीय शिवलिंगों के उदाहरण मिलते हैं।
म्यांमार के आराकान क्षेत्र के शासक आनंदचंद्र ने स्वयं को शिववंशी बताया। श्रीलंका में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के ब्राह्मी अभिलेखों और ‘महावंश’ में भी शिव पूजा का उल्लेख है। इन साक्ष्यों से स्पष्ट है कि शैव पंथ का प्रचार-प्रसार भारत से बाहर प्राचीन काल में ही हो गया था। तलवार और लालच‌ के बिना भारतीय दर्शन देश के बाहर गया और लोगों ने उसे सहर्ष स्वीकार किया।