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मखाना तो बहाना है, क्या दलित वोटरों को साध पाएंगे राहुल गांधी? ये आंकड़े तो कुछ और ही कह रहे


राहुल गांधी वैसे तो हमेशा दलितों की बात करते हैं। लेकिन सीट बंटवारे में उनका ये दलित चिंतन नहीं दिखता। ऐसे में क्या राहुल गांधी इस दफे उम्मीदवार चुनने में नई रणनीति अपनाएंगे? यही बड़ा सवाल है।
वोटर अधिकार यात्रा के दौरान कटिहार में राहुल गांधी ने मखाना की खेती करने वाले किसानों से बहुत आत्मीय मुलाकात की। खेती को समझने के लिए घुटनों तक पतलून मोड़ कर पानी में उतरे। किसानों से बात की। उनका हालचाल जाना। फिर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी प्रतिक्रिया दी- ‘बड़े शहरों में हजार, दो हजार रुपये किलो बिकता है। लेकिन मेहनतकश मजदूरों को नाम मात्र का दाम मिलता है। कौन हैं ये किसान-मजदूर ? अतिपिछड़े, दलित, बहुजन। पूरी मेहनत इन 99 प्रतिशत बहुजनों की और फायदा सिर्फ 1 प्रतिशत।’ बात तो बिल्कुल वाजिब है। लेकिन क्या राहुल गांधी सचमुच अतिपिछड़ों और दलित समुदाय के हिमायती है?
2020 में कांग्रेस ने 70 में से 32 सीटें सवर्णों को दीं – चुनाव में नेता बहुजन हितों की बात तो करते हैं हैं लेकिन जब कुछ करने का वक्त आता है तो ऐसा करने से मुकर जाते हैं। जैसे 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इन 70 में 32 सीटों पर उसने अगड़े उम्मीदवारों को उतारा था। आप भाषणों में ‘बहुजन’ की बात करते हैं लेकिन टिकट लेने में बाजी मार जाते हैं ‘कमजन’। अगर बहुजनों की राजनीतिक भागीदारी नहीं बढ़ेगी तो फिर उन्हें उनका हक कैसे मिलेगा। क्या बहुजन सिर्फ वोट बैंक हैं? मीठी-मीठी बातों से भावनाओं को जगाइए और वोट ले उड़िए। वैसे तो सवर्णों की पार्टी, भाजपा मानी जाती है। लेकिन कांग्रेस भी उससे कम नहीं है। 2020 में सबसे अधिक भाजपा ने 50 सवर्णों को टिकट दिये थे। दूसरे नम्बर पर कांग्रेस (32) ही थी। तब फिर कांग्रेस को भी अगड़ों की पार्टी क्यों न माना जाए?