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आरोप तभी लगाएं जब दोषी ठहराए जाने का उचित मौका हो… सुप्रीम कोर्ट की दो टूक


सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में चार्जशीट दाखिल करने और आरोप तय करने की उस प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई है, जिसमें पहली नजर में कोई मामला नहीं बनता। कोर्ट ने कहा कि इससे न्यायिक व्यवस्था पर बोझ बढ़ रहा है। कोर्ट ने पुलिस और निचली अदालतों से कहा है कि वे फिल्टर की तरह काम करें और यह सुनिश्चित करें कि केवल उन्हीं मामलों को मुकदमे के स्तर तक ले जाया जाए जिनमें मजबूत स्थिति हो।
कोलकाता में संपत्ति को लेकर विवाद से जुड़ा मामला – जस्टिस एनके सिंह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि सरकार को बिना किसी ठोस उम्मीद के नागरिकों पर मुकदमा नहीं चलाना चाहिए। कोर्ट ने कोलकाता में संपत्ति को लेकर हुए एक सिविल विवाद से जुड़े आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। बेंच ने कहा कि पुलिस और निचली अदालत को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि संपत्ति को लेकर एक सिविल विवाद चल रहा था और शिकायतकर्ता ने कोई न्यायिक बयान देने से भी इनकार कर दिया था।
ऐसे शीर्ष कोर्ट तक पहुंचा मामला – बेंच ने कहा कि इस मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति देने के लिए कानूनी रूप से मान्य सामग्री/सबूतों पर आधारित मजबूत शक मौजूद नहीं था। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि यह अदालत इस बात पर जोर देना चाहेगी कि जब पार्टियों के बीच कोई सिविल विवाद चल रहा हो, तो पुलिस और आपराधिक अदालतों को चार्जशीट दाखिल करने और आरोप तय करने में सतर्क रहना चाहिए।
पुलिस और अदालत क्या करें – अदालत ने कहा कि कानून के शासन वाले समाज में, चार्जशीट दाखिल करने का निर्णय जांच अधिकारी की ओर से इस निर्धारण पर आधारित होना चाहिए कि क्या एकत्र किए गए सबूत सजा की उचित संभावना प्रदान करते हैं। चार्जशीट दाखिल करने के चरण में पुलिस और आरोप तय करने के फेज में आपराधिक अदालत को प्रारंभिक फिल्टर के रूप में कार्य करना चाहिए। यह सुनिश्चित करते हुए कि केवल मजबूत शक वाले मामलों को ही न्यायिक प्रणाली की दक्षता और अखंडता बनाए रखने के लिए औपचारिक मुकदमे के स्तर तक ले जाया जाए।