
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट के एक मामले पर खुद से संज्ञान लेकर निर्देश दिया कि विदेशों में टैक्स हेवन देशों में बैठे साइबर अपराधियों तक पहुंचने के लिए सीबीआई इंटरपोल की मदद ले। डिपार्टमेंट ऑफ टेलिकम्यूनिकेशंस (DoT) को यह सुनिश्चित करने को कहा गया कि टेलीकॉम सेवा प्रदाता एक ही व्यक्ति या इकाई को कई सिम कार्ड जारी न करें, क्योंकि उनका उपयोग साइबर अपराधों में किया जा सकता है।
बेहतर समन्वय के लिए, कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से क्षेत्रीय और राज्य स्तरीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र स्थापित करने को कहा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि गृहमंत्रालय, दूरसंचार विभाग, वित्त मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय सहित विभिन्न मंत्रालयों के विचार साइबर अपराध मामलों से निपटने के लिए उसके समक्ष रखे जाएं।
सीबीआई को होगी पूरी स्वतंत्रता – शीर्ष अदालत ने कहा कि सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और उनकी पुलिस एजेंसियों के साथ-साथ सीबीआई को भी नागरिकों से धोखाधड़ी करने में इस्तेमाल किए गए बैंक खातों को फ्रीज करने की स्वतंत्रता होगी। शुरुआत में ही पीठ ने सीबीआई को आदेश दिया कि वह बैंक अधिकारियों की जांच करे, जो धोखेबाज़ों के साथ मिलकर म्यूल अकाउंट्स संचालित करने में मदद करते हैं।
CBI को बैंकरों की जांच की भी आजादी – सुप्रीम कोर्ट ने एजेंसी को और मजबूत करने के लिए, सीबीआई को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत उन बैंकरो की भूमिका की जांच करने की पूरी स्वतंत्रता दी खासकर उन मामलो में जहां बैंक खाते डिजिटल अरेस्ट घोटालो के उद्देश्य से खोले जाते हैं।
इन मामलों पर केंद्रित रहेगी कार्यवाही – अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक को भी पक्षकार बनाया और आरबीआई को यह बताने में सहायता मांगी कि वह फर्जी खातों की पहचान करने के लिए कौन से एआई और मशीन लर्निंग उपकरण उपयोग करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कार्यवाही मुख्य रूप से डिजिटल अरेस्ट घोटालों पर केंद्रित रहेगी।
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