
सुप्रीम कोर्ट के नए चीफ जस्टिस पद संभालते ही एक्शन मोड में आ गए हैं। उन्होंने शपथ ग्रहण के दिन ही फ्री स्पीच को कर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने सोमवार को कहा कि बोलने की आजादी का अधिकार हमारे सबसे कीमती अधिकारों में से एक है। इसे और मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने एक ऐसे फ्रेमवर्क की जरूरत पर भी जोर दिया। इस फ्रेमवर्क का काम पब्लिक बातचीत में जिम्मेदारी और सम्मान पक्का करना होगा। देश के 53वें CJI के तौर पर शपथ लेने के बाद हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बोलने की आजादी (फ्री स्पीच) से रेपुटेशन को नुकसान नहीं होता।
खास बात यह है कि पूर्व CJI बी आर गवई भी इस मुद्दे पर यही राय रखते थे। जस्टिस गवई ने कहा था कि बोलने की आजादी का अधिकार हमेशा संविधान में बताई गई सही पाबंदियों के तहत आता है। अगर किसी व्यक्ति की बात उन सही पाबंदियों का उल्लंघन करती है, तो यह बुनियादी अधिकार का उल्लंघन है। यह पूछे जाने पर कि क्या मौजूदा सिस्टम में गाली-गलौज या नफरत फैलाने वाले भाषणों के खिलाफ सही उपाय हैं। इस पर जस्टिस गवई ने कहा था कि मुझे लगता है कि इस बारे में एक रेगुलेटरी सिस्टम होना चाहिए। इस मुद्दे पर फैसला संसद को लेना है।
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