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दल नहीं सदन का होता है स्पीकर


लोकसभा में विपक्ष ने अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने का नोटिस दिया है। यह कदम उनके कामकाज और कथित पक्षपात के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि संख्या बल को देखते हुए प्रस्ताव पास होने की कोई संभावना नहीं। अब तक 118 सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं। लेकिन तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इससे खुद को अलग रखा है। लिहाजा विपक्ष की ताकत और कमजोर हो गई है।
संख्या मुद्दा नहीं। 2022 में उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी तृणमूल कांग्रेस ने वोटिंग का बहिष्कार किया था, जिससे जगदीप धनखड़ को परोक्ष रूप से फायदा मिला था। इस बार भी तृणमूल के अलग रहने से विरोधी सांसदों की संख्या घट गई है। लेकिन, मुद्दा सिर्फ संख्या नहीं है। अध्यक्ष सदन का सबसे बड़ा अधिकारी होता है। उसकी ताकत ही सदन की ताकत मानी जाती है। लोकसभा की व्यवस्था ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स के मॉडल पर बनी है।
ब्रिटिश परंपरा। ब्रिटेन में एक समय ऐसी परंपरा थी कि अगर कोई व्यक्ति स्पीकर बन गया, तो अगली बार उसके चुनाव में कोई भी पार्टी उसके खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारती थी। स्पीकर भी पूरी निष्पक्षता से काम करता था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘डेनिसन का नियम’ (Denison’s Rule) है। जॉन एवलिन डेनिसन 1857 से 1872 तक स्पीकर रहे। साल 1867 में ट्रिनिटी कॉलेज, डबलिन से जुड़े एक विधेयक पर सदन में बराबर वोट पड़े। जब पक्ष और विपक्ष के वोट बराबर हो जाते हैं, तो स्पीकर को निर्णायक मत यानी कास्टिंग वोट देना पड़ता है।
अनुकरणीय उदाहरण। डेनिसन ने उस विधेयक के खिलाफ वोट दिया, जबकि व्यक्तिगत रूप से वह उसके समर्थन में थे। उनका मानना था कि अगर किसी बिल का इतना विरोध है कि वोट बराबर हो जाएं, तो उसे सिर्फ स्पीकर के वोट से कानून नहीं बनाना चाहिए। उस पर और बहस होनी चाहिए। अब ब्रिटेन में भी पार्टियां स्पीकर के खिलाफ उम्मीदवार खड़े करने लगी हैं। हालांकि आज भी स्पीकर निर्वाचित होने के बाद दल से इस्तीफा दे देता है।
पार्टी प्रमुख नहीं। भारत में लोकसभा अध्यक्ष अपने राजनीतिक दल से इस्तीफा नहीं देता। 2008 में एक अजीब स्थिति बनी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने UPA सरकार से समर्थन वापस ले लिया। उसी दल के सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष थे। पार्टी ने उनसे इस्तीफा देने को कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इस पर पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया। सोमनाथ चटर्जी ने इस्तीफा न देकर यह संदेश दिया कि वह पार्टी नहीं, सदन के अध्यक्ष हैं। अगर वह इस्तीफा देते, तो उनके फैसलों पर पक्षपात के आरोप लग सकते थे।
पुराने मामले। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की परंपरा पहली लोकसभा से ही शुरू हो गई थी। 18 दिसंबर 1954 को जहानाबाद के समाजवादी सांसद विज्ञेश्वर मिश्र ने अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। वहां भी आरोप निष्पक्षता का था, पर प्रस्ताव गिर गया। 1966 में हुकुम सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, पर जरूरी समर्थन न मिलने से वह स्वीकार नहीं हुआ।
बोलने का हक। नियम के अनुसार, अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा के समय वह खुद पीठासीन अधिकारी नहीं रहते। ओम बिरला ने चर्चा शुरू होने से पहले ही खुद को कार्यवाही से अलग कर लिया, जिसे सकारात्मक कदम माना जा सकता है। विपक्ष का आरोप है कि नेता प्रतिपक्ष को बोलने नहीं दिया गया। विपक्ष को अपनी बात रखने का पूरा हक है, लेकिन सिर्फ विरोध करना ठीक नहीं। सरकार को भी बोलने का अधिकार है। दोनों पक्षों के बीच बढ़ती कटुता लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है।
भरोसे का सवाल। अध्यक्ष की जिम्मेदारी है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष – दोनों को बराबर मौका मिले और सदन की कार्यवाही ठीक से चले। अध्यक्ष को न सिर्फ निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए। लेकिन, पिछले कई दशकों से पीठासीन अधिकारी निष्पक्षता के धर्म का निर्वाह नहीं कर रहे। राज्यों में भी हालात ऐसे ही हैं।
निष्पक्षता बनाए रखने के लिए कानून बनाया जा सकता है कि जो व्यक्ति एक बार अध्यक्ष या सभापति बन जाए, वह बाद में सक्रिय राजनीति में न लौटे। अध्यक्ष के पास बड़े अधिकार होते हैं, इसलिए उन्हें पूरे सदन का भरोसा जीतना चाहिए। सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि इस पद की गरिमा बनी रहे।