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होर्मुज पर ईरान-भारत में क्या हुई डील, भाग गया NATO, हिल गई अमेरिका और यूरोप की जमीन


ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध के 18वें दिन आते-आते जियोपॉलिटिक्स बहुत बदल चुकी है। इसका सबसे बड़ा कारण होर्मुज जलडमरूमध्य है, जिसने दुनिया भर में कच्चे तेल और एलपीजी-एलनजी की सप्लाई चेन तोड़ दिया है।
होर्मुज संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में भारत भी शामिल है। लेकिन,पिछले एक हफ्ते में इसने ईरान के साथ मिलकर ऐसा रास्ता निकाल लिया है कि भारतीय तेल और गैस टैंकर होर्मुज से बड़े ही शान से निकल रहे हैं और अमेरिका-इजरायल और उनके सहयोगियों के साथ इसकी दोस्ती भी गाढ़ी हुई है। भारत की यह सफलता इस समय अमेरिका, उसके सहयोगियों और पूरे विश्व के लिए भी सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
इंडियन नेवी की सुरक्षा में निकल आ रहे भारतीय जहाज – होर्मुज स्ट्रेट और ओमान की खाड़ी जैसे युद्धग्रस्त क्षेत्र से कम से कम तीन भारतीय एलपीजी (शिवालिक और नंदा देवी) और तेल टैंकर (जग लाडकी) सुरक्षित निकल आए हैं।
इसके लिए भारत ने न सिर्फ ईरान के साथ कूटनीतिक चर्चा की है, बल्कि अपने जहाजों और अपने नागरिकों को सुरक्षित लाने के लिए होर्मुज इलाके में इंडियन नेवी के जंगी जहाजों को भी तैनात कर रखे हैं और इनको सुरक्षा घेरे में भारतीय समुद्र तक लाया भी जा रहा है।
भारत-ईरान की कूटनीतिक डील पर दुनिया की नजर – ऐसे समय में जब होर्मुज से दुनिया के अन्य देशों का जहाज निकलना मुश्किल है, भारत को कामयाबी कैसे मिली, इसी को लेकर रॉयटर्स जैसी एजेंसी ने पहले दावा किया कि इसके बदले भारत को सीज किए गए ईरानी टैंकरों को छोड़ना पड़ेगा। लेकिन, भारत ने उनके ऐसे दावों की भी हवा निकाल दी।
अमेरिका को नाटो और अन्य सहयोगियों से लगा झटका – अमेरिकी मीडिया की मानें तो होर्मुज की स्थिति को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बहुत ही ज्यादा चिढ़े हुए हैं। क्योंकि, उन्होंने लाख कोशिशें कर लीं, लेकिन न तो नाटो सहयोगी और न तो कोई और होर्मुज में अपनी नेवी उतारने का साहस जुटा सका।
मैं चाह रहा हूं कि ये देश (होर्मुज के रास्ते तेल आयात करने वाले) आएं और अपने खुद के क्षेत्र (होर्मुज स्ट्रेट) की रक्षा करें…इसी जगह से उन्हें तेल और गैस मिलता है।
अमेरिकी मीडिया के अनुसार ट्रंप चाहते थे कि जापान और यूरोप के देश, यहां तक कि चीन भी होर्मुज स्ट्रेट के आसपास अपने नेवी भेजें, जो मध्य-पूर्व एशिया के तेल के भरोसे रहते हैं। लेकिन, ट्रंप की सुनने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ।
होर्मुज स्ट्रेट संकट पर अलग-थलग पड़ गया अमेरिका – सीएनएन जैसी अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टिंग के अनुसार इस मसले पर अमेरिका अलग-थलग पड़ता नजर आ रहा है, क्योंकि ट्रंप नाटो और अपने अन्य सहयोगियों पर बार-बार भड़क रहे हैं। ब्लूमबर्ग और वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट भी जापान और ऑस्ट्रेलिया के मुंह फेरने की ओर इशारा कर रहे हैं।
भारत की कूटनीति की यूरोप की मीडिया कर रही तारीफ – यूरोप और यूके मीडिया की रिपोर्टिंग से भी पता चलता है कि वह भारतीय कूटनीति से भौंचक्के नजर आ रहे हैं। बीबीसी भारत की होर्मुज सफलता को ‘तर्क और तालमेल’ वाला मॉडल बता रहा है।
इसकी रिपोर्ट में होर्मुज से भारतीय टैंकरों के सुरक्षित निकलने और ईरान के साथ-साथ अमेरिका और इजरायल के साथ संतुलित तालमेल बनाए रखने का जिक्र है, जबकि एलपीजी की वजह से इसे घरेलू स्तर पर बहुत ज्यादा दबाव झेलना पड़ रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका और यूरोप में बिगड़ गया तालमेल – यूरोप की एक प्रमुख मीडिया द गार्डियन लिखता है कि होर्मुज पर ट्रंप के दबाव पर ‘एक समान नकारात्मक’ प्रतिक्रिया है।
जर्मनी और यूके साफ कर चुके हैं कि वह ‘व्यापक युद्ध’ का हिस्सा नहीं बनेंगे।
यूरोपियन यूनियन, अमेरिका के साथ युद्ध में शामिल होने की जगह रक्षात्मक उपायों को प्राथमिकता दे रहा है।
द टेलीग्राफ का कहना है कि यूरोप के विश्लेषक भारतीय कूटनीति को कामयाबी का मंत्र बता रहे हैं।
फिनलैंड जैसे देश को तो अब भारत से ही उम्मीद बची है और उसने इससे अमेरिकी और ईरान के बीच युद्ध रुकवाने के लिए इससे दखल देने की अपील भी की है।
फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने साफ कहा है, ‘हम सीजफायर चाहते हैं। मैं सोच रहा हूं कि क्या सचमुच भारत इसमें शामिल हो सकता है। हमने विदेश मंत्री एस जयशंकर को स्थिति को शांत करने के लिए युद्धविराम का आह्ववान करते देखा है।’