
अमेरिका ने मिलन-2026 युद्धाभ्यास से लौट रहे ईरानी जहाज देना (IRIS Dena) को श्रीलंका के पास हिंद महासागर में डुबो दिया। इसके लिए अमेरिकी नौसेना की पनडुब्बी ने खतरनाक मार्क-48 हैवीवेट टॉरपीडो के जरिये इस काम को अंजाम दिया। अमेरिका ने यह जता दिया कि उसके पास ऐसी शिकारी पनडुब्बी है, जो स्टेल्थ टेक्नोलॉजी से लैस होने के साथ-साथ परमाणु ऊर्जा से चलती है। हालांकि, भारत को इस तरह की ‘स्वदेशी पनडुब्बी’ हासिल करने में अभी करीब 10 साल और लग सकता है।
भारत के पास अमेरिका जैसी मारक क्षमता 2036 तक – द इकनॉमिक टाइम्स की एक खबर के अनुसार, अमेरिका जैसी पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी 2036 तक ही तैयार हो पाएगी। भारत के पास फिलहाल अभी रूस से मंगाई गई किलो क्लास, जर्मन मूल की HDW क्लास और फ्रांसीसी मूल की स्कार्पीन क्लास न्यूक्लियर अटैक सबमरीन (SSN) है।
2035 तक 200 से अधिक जहाजी बेड़ा तैयार करेगा भारत – हाल ही में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने कहा था कि भारतीय नौसेना का लक्ष्य 2035 तक 200 से अधिक जहाजों वाली नौसैनिक बेड़ा बनाना है।
वहीं, 2026 में 15 अतिरिक्त जहाजों को शामिल करने की योजना है। उन्होंने चेन्नई बंदरगाह पर आईएनएस अंजदीप को सेवा में शामिल किए जाने के बाद कहा कि नौसेना का दीर्घकालिक मकसद 2047 तक पूरी तरह से आत्मनिर्भरता हासिल करना है।
SSN क्लास पनडुब्बी बना रहा भारत – नौसेना प्रमुख ने दिनेश त्रिपाठी ने भी कहा था- 2025 के दौरान भारतीय नौसेना ने 12 युद्धपोत और एक पनडुब्बी को शामिल किया। भारत ने अपनी श्रेणी की विशेष पनडुब्बी (SSN) के निर्माण की परियोजना शुरू कर दी है, जिसे टॉप लेवल पर मंजूरी मिल चुकी है। इसकी जटिलता को देखते हुए भारत ने परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियां बनाई हैं, लेकिन हमलावर पनडुब्बियों के लिए अलग स्तर की गोपनीयता और शक्ति की आवश्यकता होती है।
विकास चरण में कम से कम चार साल लगने की संभावना है, जिसके बाद निर्माण और परीक्षण होंगे और 2036 तक इनके सेवा में शामिल होने का अनुमान है।
रूस के साथ प्रोजेक्ट चक्र के तहत डिलीवरी में देरी – रिपोर्ट्स के अनुसर, क्षमता में इस कमी को ध्यान में रखते हुए, भारत ने प्रशिक्षण मिशन और निवारक गश्ती दोनों के लिए रूस के साथ ‘प्रोजेक्ट चक्र’ के तहत एक नवीनीकृत एसएसबीएन (SSBN) के लिए पट्टा समझौता किया था। हालांकि, रूसी योजना धराशायी हो गई है और पनडुब्बी 2025 की निर्धारित डिलीवरी तिथि से चूक गई है।
यूक्रेन के साथ चल रहे संघर्ष सहित कई कारकों ने पनडुब्बी की डिलीवरी में काफी देरी की है, जिसके अब 2028 तक होने का अनुमान है। भारत ने वरिष्ठ नौसेना अधिकारियों की हालिया बैठकों सहित कई बार रूस के साथ इस मुद्दे को उठाया है।
भारत के पास पहले से अरिहंत क्लास की पनडुब्बियां – भारत के पास पहले से ही अरिहंत श्रेणी की परमाणु-संचालित और परमाणु-हथियारबंद पनडुब्बियां (एसएसबीएन) हैं। नई परमाणु-हमला पनडुब्बियां कहीं अधिक गुप्त होंगी और पारंपरिक हथियारों से लैस होंगी। सुरक्षा पर कैबिनेट समिति ने अक्टूबर में ₹35,000 करोड़ के अधिग्रहण को मंजूरी दी थी, जिसमें काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्राइवेट इंडस्ट्री कर सकती है।
परमाणु ऊर्जा चालित पोत बनाने की क्षमता चीन के पास भी नहीं – नवभारत टाइम्स की एक खबर के अनुसार, केवल दो देश ही परमाणु ऊर्जा चालित विमानवाहक पोत बना पाए हैं-अमेरिका और फ्रांस। जहां सभी 11 अमेरिकी विमानवाहक पोत परमाणु ऊर्जा चालित हैं, वहीं फ्रांस का एकमात्र विमानवाहक पोत चार्ल्स डी गॉल भी परमाणु ऊर्जा चालित है।
माना जा रहा है कि चीन अपने चौथे विमानवाहक पोत, टाइप 004 पर काम कर रहा है, जो संभव है कि परमाणु ऊर्जा से चलेगा। भारत के पास परमाणु ऊर्जा चालित दो ही पनडुब्बियां हैं। आईएनएस अरिहंत और दूसरी है आईएनएस अरिघात। बाकी पर काम चल रहा है।
टारपीडो समंदर के नीचे चलने वाली मिसाइल – अमेरिका ने जिस टारपीडो के जरिये ईरानी जहाज को डुबोया वो एक ऑटोमेटिक सिगार के आकार की समंदर के भीतर चलने वाली मिसाइल है, जो थर्मल इंजन के जरिये सोनार से लैस जाइरोस्कोप का इस्तेमाल करती है।
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