
सबरीमला केस में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि हर व्यक्ति को सभी मंदिरों और मठों तक पहुंच मिलनी चाहिए। किसी एक वर्ग के नाम पर दूसरों को जाने से रोका, तो नकारात्मक असर हिंदू धर्म पर पड़ेगा और समाज में विभाजन बढ़ेगा। केंद्र ने सबरीमला मंदिर में विशेष आयुवर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक का समर्थन किया। कहा, 2018 का फैसला इस धारणा पर आधारित था कि पुरुष श्रेष्ठ हैं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि यह पुरुष-केंद्रित या महिला-केंद्रित धार्मिक मान्यताओं का सवाल नहीं है। सीनियर वकील सीएस वैद्यनाथन ने कहा कि श्री वेंकटरमणा देवेरू बनाम मैसूर राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट का पुराना फैसला सही नहीं था। उस फैसले में कोर्ट ने माना था कि सार्वजनिक प्रकृति के मंदिरों में सभी वर्गों के हिंदुओं को प्रवेश मिलना चाहिए, भले ही मंदिर किसी विशेष संप्रदाय से जुड़ा हो।
‘दूसरे धर्मों के लोगों की एंट्री पर पूरी रोक नहीं’ – वैद्यनाथन ने कहा, सबरीमाला मंदिर में दूसरे धर्मों के लोगों के प्रवेश पर पूर्ण रोक नहीं है। अगर कोई ईसाई या मुस्लिम भगवान अयप्पा में आस्था रखता है तो उसके प्रवेश पर रोक नहीं है। धार्मिक संप्रदाय की अवधारणा को सिर्फ एक धर्म में सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
जजों ने दिए अलग-अलग उदाहरण – जस्टिस सुंदरेश ने कहा, केरल के कुछ मंदिरों में शर्ट पहनकर प्रवेश की अनुमति नहीं होती। ऐसे में कोई यह नहीं कह सकता कि वह अपनी इच्छा से शर्ट पहनकर ही मंदिर जाएगा। CJI सूर्यकांत बोले, गुरुवायूर मंदिर में पुरुषों को शर्ट पहनने की अनुमति नहीं है।
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