
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया से एक ऐसा चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। OpenAI ने अपने कुछ बेहद एडवांस AI एजेंट्स की टेस्टिंग के लिए उन्हें अलग-अलग सुरक्षित सैंडबॉक्स में बंद किया था। यहां न तो कोई इंटरनेट कनेक्शन था, न कोई नेटवर्क और न ही फाइल्स शेयर करने की सुविधा। इसके बावजूद इन एजेंट्स ने कंप्यूटर के प्रोसेसर कैशे मेमोरी का इस्तेमाल कर आपस में संपर्क साधने की तरकीब निकाल ली। तकनीकी लिहाज से यह भले ही एक बड़ा प्रयोग हो, लेकिन क्लाउड सिक्योरिटी और भविष्य में AI पर इंसानी नियंत्रण को लेकर गंभीर खतरे की घंटी है।
बिना इंटरनेट AI ने कैसे की आपस में बात? – रिपोर्ट्स के मुताबिक,OpenAI के शोधकर्ता यह परख रहे थे कि क्या अलग-अलग वर्चुअल मशीनों में पूरी तरह अलग-थलग रखे गए AI एजेंट्स बिना नेटवर्क के भी बात कर सकते हैं या नहीं। प्रयोग के दौरान एक एजेंट ने प्रोसेसर की कैशे मेमोरी से चुनिंदा डेटा हटाना शुरू किया, जबकि दूसरे एजेंट ने इस बात पर नजर रखी कि वह डेटा दोबारा लोड होने में कितना समय ले रहा है। कंप्यूटर के तेज और धीमे रिस्पॉन्स टाइम को आधार बनाकर दोनों एजेंट्स ने आपस में कोड लैंग्वेज में बातचीत शुरू कर दी।
चोरी-छिपे बातचीत के तीन रास्ते निकाले – हैरानी की बात यह रही कि AI एजेंट्स सिर्फ प्रोसेसर तक ही सीमित नहीं रहे, उन्होंने संपर्क साधने के तीन और रास्ते भी ढूंढ निकाले।
स्टोरेज के जरिए कोड सिग्नल: एक एजेंट ने सिस्टम में फाइल सेव करने और रुकने के अंतराल को तय किया। जिस तरह टॉर्च की लाइट जला-बुझाकर मोर्स कोड में बात की जाती है, ठीक वैसे ही इस गैप की टाइमिंग से दूसरे एजेंट ने संदेश समझ लिया।
सिस्टम की स्पीड से इशारा: जब दोनों एजेंट एक ही सर्वर पर थे, तो एक एजेंट ने सिस्टम पर जानबूझकर भारी लोड डाला जिससे कंप्यूटर धीमा हुआ, और दूसरे ने सिस्टम की इसी सुस्त-तेज चाल से सिग्नल पकड़ लिया।
सिक्योरिटी रिकॉर्ड्स में हेरफेर: तीसरे तरीके में उन्होंने सिस्टम के सुरक्षा रिकॉर्ड्स में बदलाव कर एक-दूसरे तक बात पहुंचाई। हालांकि, OpenAI का कहना है कि ये तरीके इतने धीमे और जटिल हैं कि इनके जरिए किसी बड़े डेटा की चोरी करना फिलहाल मुमकिन नहीं दिखता।
इंसानों की समझ से आगे निकल रहे नए मॉडल्स – OpenAI का मानना है कि भविष्य में आने वाले AI मॉडल्स ऐसे सुरक्षा लूपहोल्स ढूंढने में सक्षम होंगे, जिनका इंसान अभी अंदाजा भी नहीं लगा सकते। जुलाई में हगिंग फेस और सितंबर में डीएनएस से जुड़ी सुरक्षा घटनाओं के बाद कंपनी ने अपने मॉडल्स की रेड-टीम टेस्टिंग और आंतरिक ऑडिट को काफी सख्त कर दिया है, ताकि भविष्य में AI की इस तरह की चालाकियों पर कड़ा पहरा रखा जा सके।
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