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जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल की सेवा, श्रृंगार और पूजा में जरूर शामिल करें ये चीजें


भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। इस बार यह तिथि 4 सितंबर, शुक्रवार को पड़ रही है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन विधि-विधान से व्रत, बाल गोपाल की सेवा और पूजा की जाती है। साथ ही, मध्य रात्रि में जन्मोत्सव के समय कृष्णजी का जल व पंचामृत से अभिषेक करके उन्हें वस्त्र पहनाए जाते हैं। पूरा श्रृंगार करने के बाद उन्हें झूला झुलाया जाता है। ऐसे में जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल की सेवा, पूजा और श्रृंगार में अनेक प्रकार की चीजों की आवश्यकता होती है। कुछ चीजों के बिना कान्हाजी की पूजा और सेवा अधूरी रह सकती है। ऐसे में आइए विस्तार से जानते हैं कि जन्माष्टमी के दिन किन-किन चीजों की आवश्यकता होती है। विस्तार से पढ़ें जन्माष्टमी पूजा, सेवा और श्रृंगार सामग्री लिस्ट।
नई पोशाक
मुकूट
मोरपंख
बांसुरी
कंगन
पायल
कमरबंद
तुलसी, मोतियों व फूलों की माला
चंदन का तिलक
सुबह का भोग
जल
दीपक
कामधेनु गाय बछड़े सहित
जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण अभिषेक सामग्री – दूध, घी, दही, जल, शक्कर
गंगाजल
इत्र
लड्डू गोपाल के लिए सूती वस्त्र
जन्माष्टमी पूजा सामग्री
सिंहासन अथवा झूला, धूप, कपूर, रोली, चंदन, सिंदूर – यज्ञोपवीत, अक्षत, सुपारी, हल्दी, पान के पत्ते
रुई, ताजे पुष्पों की माला और फूल, सप्तधान
दूर्वा, दही, गंगाजल, दीपक
जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण भोग सामग्री
मौसमी फल
माखन-मिश्री
पंचमेवा
शक्कर
मिष्ठान
छोटी इलायची
औषधि
पंचामृत
नारियल
खीरा
केले के पत्ते
तुलसी दल
जन्माष्टमी के दिन सुबह से लेकर मध्य रात्रि की पूजा में इन चीजों को जरूर शामिल करना चाहिए। मान्यता है कि विधि-विधान से व्रत और लड्डू गोपाल की पूजा करने से कान्हाजी प्रसन्न होते हैं। साथ ही, उनकी कृपा से परिवार में सालभर खुशियां बनी रह सकती हैं।
जन्माष्टमी का महत्व – शास्त्रों और कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर रोहिणी नक्षत्र में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। इस तिथि पर चंद्रमा वृषभ राशि और सूर्य सिंह राशि में विराजमान थे। यही कारण है कि हर साल भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन भगवान के बाल स्वरूप की पूजा और रात्रि में भजन करने का अत्यंत महत्व होता है। वहीं, मध्य रात्रि में लड्डू गोपाल का अभिषेक करने के बाद उन्हें वस्त्र व आभूषण पहनाए जाते हैं। फिर, झूले में बैठाकर झूला झुलाया जाता है और अनेक प्रकार के भोग लगाने का विधान होता है। साथ ही, जन्माष्टमी पर चंद्रमा के दर्शन और जल अर्पित करने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त हो सकती है।