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‘BRICS में ना जाना भूल, शेख हसीना पर जिद करना समझदारी नहीं’, बांग्लादेशी एक्सपर्ट की तारिक को सलाह


बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान भारत के न्योते पर द्विपक्षीय बैठक के लिए नई दिल्ली नहीं आए। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह 5 अगस्त को शेख हसीना का प्रेस कॉन्फ्रेंस था। भारत ने आधिकारिक तौर पर तारिक रहमान को दिल्ली आने का न्योता भेजा था। लेकिन भारत ने बांग्लादेश को 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के विस्तारित सत्र में भाग लेने के लिए भी आमंत्रित किया हुआ है।
बांग्लादेश को इस बार यह निमंत्रण बिम्सटेक (BIMSTEC) के मौजूदा अध्यक्ष के तौर पर दिया गया है। ढाका स्थित इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ बिजनेस में डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर गोलम रसूल ने एक ‘प्रोथोम आलो’ में लिखा है कि भारत की तरफ से द्विपक्षीय बैठक के लिए न्योता भेजना और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए न्योता भेजना, इन दोनों निमंत्रणों का राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व एक जैसा नहीं है। पहला निमंत्रण द्विपक्षीय संबंधों का हिस्सा है जबकि दूसरा बांग्लादेश की व्यापक क्षेत्रीय जिम्मेदारियों से जुड़ा है।
तारिक रहमान के लिए होना चाहिए ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ – प्रोफेसर गोलम रसूल ने लिखा है कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण से भी ज्यादा बड़ी बात प्रधानमंत्री के लिए ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ होना चाहिए। उन्होंने लिखा है कि विदेश नीति में इस नारे को असल मायने देने का मतलब न तो किसी देश का आंख बंद करके साथ देना है और न ही आंख बंद करके विरोध करना है। इसका मतलब है बांग्लादेश की संप्रभुता, सुरक्षा, आर्थिक हितों और लंबे समय के रणनीतिक हितों के आधार पर हर फैसले को परखना।’
उन्होंने लिखा है ‘यही सिद्धांत भारत के साथ रिश्तों के मामले में भी लागू होता है। इसलिए शेख हसीना का प्रत्यर्पण प्रधानमंत्री की भारत की द्विपक्षीय यात्रा और BIMSTEC के अध्यक्ष के तौर पर ब्रिक्स (BRICS) के विस्तार वाले सत्र में बांग्लादेश की भागीदारी को अलग-अलग घटनाओं के तौर पर नहीं बल्कि बांग्लादेश के व्यापक राष्ट्रीय हितों के नजरिए से देखा जाना चाहिए।’
‘शेख हसीना के प्रत्यर्पण को सबसे बड़ा जिद बनाना गलत’ – प्रोफेसर गोलम रसूल ने सलाह देते हुए लिखा है कि बांग्लादेश के लिए शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग से पीछे हटने का कोई कारण नहीं है। लेकिन इस मांग को इतनी कड़ी शर्त बना देना कि इससे उच्च-स्तरीय सीधी बातचीत की गुंजाइश कम हो जाए, कूटनीतिक समझदारी नहीं है। बांग्लादेश की नीति न तो भारत के प्रति आंख मूंदकर वफादारी दिखाने वाली होनी चाहिए और न ही बेवजह विरोध करने वाली। इसी तरह सिर्फ सख्ती दिखाने के लिए ऐसा रुख अपनाना जिससे बातचीत की गुंजाइश कम हो जाए यह भी सही नहीं होगा।
उन्होंने लिखा है कि अगर प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा और BIMSTEC अध्यक्ष के तौर पर ब्रिक्स (BRICS) के विस्तारित सत्र में शामिल होना उन हितों को हासिल करने के लिए असरदार कूटनीतिक साधन साबित हो सकता है तो उस मौके को नहीं गंवाना चाहिए। मांग पर सख्ती बनी रहनी चाहिए लेकिन कूटनीति के दरवाजे भी खुले रखने चाहिए क्योंकि सफलता का आकलन सिर्फ इस आधार पर नहीं होता कि हम क्या मांगते हैं बल्कि अंत में इस आधार पर होता है कि बांग्लादेश उन मांगों से क्या हासिल करता है।