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‘बच्चा छोटा है, मैं कुछ नहीं कर सकती’…मां की इस सोच पर लेखक ने लगाई फटकार, बोले-फिर तो बच्चा कभी बड़ा नहीं होगा


अगर आपकी भी यही सोच है कि बच्चा बड़ा होने के बाद ही आप अपने करियर पर ध्यान देंगी, तो आचार्य प्रशांत की बात जरूर समझनी चाहिए। उनका मानना है कि यह सोच सही नहीं है। मांओं को समय का संतुलन बनाकर बच्चे की परवरिश के साथ अपनी जिंदगी और करियर पर भी ध्यान देना चाहिए।
कई बार मदर्स को यह सोचती हैं कि उनका बच्चा अभी छोटा है, जब बड़ा हो जाएगा तब वह कुछ करेंगी। हालांकि, इस सोच पर मशहूर लेखक आचार्य प्रशांत ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस तरह की सोच रखने वाली मांओं के बच्चे कभी बड़े नहीं हो पाते, क्योंकि मम्‍म‍ियां यह मान लेती हैं कि उनके बिना कुछ नहीं हो सकता। हालांकि, यह धारणा बेहद गलत है। बच्चे को जितना समय देना जरूरी है, उतना दीजिए और फिर खुद पर ध्‍यान दीज‍िए।
बच्‍चा अभी बहुत छोटा है, इसील‍िए कुछ नहीं कर सकती – मशहूर लेखक आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हाल ही में एक महिला ने कहा कि बच्चा अभी बहुत छोटा है, इसलिए मैं कुछ नहीं कर सकती। जब उन्होंने पूछा कि बच्चा कितना छोटा है, तो महिला ने बताया कि वह 14 साल का है, जब वह बड़ा हो जाएगा, तब वह कुछ करेंगी।
ऐसे तो बच्‍चा कभी बड़ा नहीं होगा – ​आचार्य प्रशांत कहते हैं कि यह सुनने के बाद उन्होंने उस महिला से कहा कि वह बच्चा कभी बड़ा नहीं होगा, क्योंकि वह पहले ही बड़ा हो चुका है। उनका कहना था कि जितना समय बच्चे को दिन में मां का देना जरूरी है, उतना समय तय कर दें और फिर अपने बाकी कामों पर ध्यान दें। मान लीज‍िए आपका दिन 21 घंटे का ही होना चाहिए।
इन लोगों के बारे में भी सोच‍िए – वे कहते हैं उन लोगों को सोचिए जिनके तीन घंटे किसी अलग जरूरत में लगते हैं, जैसे किसी को फिजियोथैरेपी करानी होती है या किसी को डायलिसिस करानी होती है। तो क्या वे जीना छोड़ देते हैं? नहीं, वे अपनी डेली रूटीन में से उतना समय अलग कर लेते हैं। उनका दिन 24 घंटे का ही होता है, जिसमें से मान लीजिए 6 घंटे डायलिसिस या फिजियोथैरेपी में चले जाते हैं, तो वे बाकी समय के अनुसार अपनी दिनचर्या को एडजस्ट करते हैं।
बच्‍चे मां के बारे में ऐसा नहीं सोचते – मां अक्सर यह सोचती हैं कि अगर वे नहीं रहेंगी तो उनके बच्चों का क्या होगा। लेकिन बच्चे इस बात को वैसे नहीं सोचते। कई बार बच्चा तक साफ कह भी देता है- ‘मम्मी, थोड़ा समझदारी से सोचो।’ इसलिए जरूरत से ज्यादा चिंता करके खुद को हर समय ‘जरूरी’ साबित करने की कोशिश करना सही नहीं है। Image-IStock
इस सोच से बाहर न‍िकलें – आचार्य कहते हैं कि हमें फैक्ट्स और इमैजिनेशन के बीच अंतर करना सीखना चाहिए। ब्रह्मांड का इतिहास अरबों-खरबों वर्षों का है, और उसमें मदर्स की मौजूदगी क‍ितने समय के ल‍िए रही है। लेक‍िन दावा यह है क‍ि ‘अगर मैं नहीं रहूंगी तो क्‍या होगा’ या ‘सब कुछ मैंने ही संभाल रखा है।’ इस सोच से बाहर न‍िकल‍िए।