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बिहार में भीड़ से नहीं जात से वोट मिलता है, कांग्रेस के पास है क्या? जानिए


क्या ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के बाद बिहार में कांग्रेस का कद बढ़ जाएगा? क्या विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अधिक सीटें लेने के लिए राजद से सौदेबाजी कर पाएगी? सबसे खास बात ये कि क्या राहुल गांधी की सभाओं में जुटी भीड़, कांग्रेस के लिए वोट में तब्दील हो जाएगी? यहां किसी दल को वोट मिलने का पैमाना ये है कि उसका जातीय आधार क्या है? फिलहाल बिहार में कांग्रेस का कोई जातीय आधार नहीं है। यादव मतदाता राजद के साथ हैं। अतिपिछड़े जदयू के साथ हैं। सवर्ण भाजपा के साथ हैं। मुस्लिम राजद और जदयू में बंटे हुए हैं। दलित वोटर भी भाजपा, जदयू और राजद में बंटे हुए हैं। कांग्रेस के हिस्से में जातीय समूहों के छिटपुट वोट ही आते हैं। बिहार में कांग्रेस को थोड़ी बहुत सीटें इसलिए मिल जाती हैं, क्योंकि उसे कभी राजद तो कभी जदयू का सहारा मिल जाता है। अकेले कांग्रेस की हैसियत सन 2000 के चुनाव में सामने आ गयी थी, जब उसे 324 में से केवल 23 सीटें मिलीं थीं। अगर कांग्रेस अकेले चुनाव लड़े तो उसे शायद ही सोनिया गांधी या राहुल गांधी के नाम पर वोट मिले। हां, कांग्रेस के कुछ नेता अपनी व्यक्तिगत क्षमता से जरूर जीतते रहे हैं।
लालू बिहार में कांग्रेस को कुछ नहीं समझते – बिहार में अभी कांग्रेस, लालू यादव की बैसाखी पर खड़ी है। केन्द्रीय राजनीति में लालू यादव भले कांग्रेस के समर्थक रहे हैं, लेकिन राज्य की राजनीति में वे इसे भाव नहीं देते। मनमोहन सरकार में रहते हुए भी लालू यादव ने बिहार में कांग्रेस का न केवल विरोध किया था, बल्कि अपमानित भी किया था। 2004 में लालू यादव रेल मंत्री थे। 2009 का लोकसभा चुनाव आया तो कांग्रेस यह समझ रही थी कि साझीदार होने के कारण लालू यादव सीट बंटवारे में उसे सम्मानजनक हिस्सा देंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा बिल्कुल नहीं किया। सीट शेयरिंग को लेकर लालू यादव कांग्रेस पर भड़क गये। कांग्रेस से खटपट होने के बाद ये अफवाह उड़ने लगी कि लालू यादव अब रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे देंगे। चूंकि केन्द्र सरकार लालू यादव के 22 संसदों के समर्थन से चल रही थी, इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लालू यादव को पद से हटा नहीं सकते थे।
अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए लालू यादव ने मार्च 2009 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उनका रवैया बहुत सख्त था। उन्होंने कहा, ‘न तो मैंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दिया है और न ही ऐसा कोई विचार है। धूर्त लोग मेरे इस्तीफे की बात उड़ा रहे हैं। हमने कांग्रेस को तीन (कुल 40 में 3) सीटें दी हैं। अगर उसका तीन से भी पेट नहीं भरता है तो मैं एक और सीट देने के लिए तैयार था। इसके बाद भी कांग्रेस में कई ‘व्याकुल भारत’ हैं, जिनके चलते दोनों दलों में गलतफहमियां पैदा हो रही हैं। सच्चाई ये है कि कांग्रेस बिहार में कहीं है ही नहीं। जो तीन सीटें दी हैं, वे भी मेरी सीटें हैं। इससे ज्यादा सीट कांग्रेस को देना तो सीट गंवाने की तरह है। अब तो हम कांग्रेस को ये तीन सीटें भी नहीं देंगे। इन तीनों पर हम ही चुनाव लड़ेंगे। अगर कांग्रेस इतनी ही ताकतवर है तो वह सीटें मांग क्यों रही है। सोनिया जी को तब पता चलेगा जब चुनाव के नतीजे आएंगे।’ इस तरह लालू यादव ने कांग्रेस की सरकार में रह कर ही कांग्रेस को उसकी औकात दिखा दी थी। सीधे-सीधे सोनिया गांधी को चैलेंज कर दिया था।
कांग्रेस को अधिक सीट देना हारने के बराबर: लालू – 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा था। कुल 37 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। जीत केवल 2 पर मिली। यानी लालू यादव का आंकलन सही निकला कि बिहार में कांग्रेस की हैसियत तीन-चार सीटों से अधिक नहीं है। बिहार में कांग्रेस को लेकर लालू यादव का विचार कभी नहीं बदला। उनका मानना रहा है कि बिहार में कांग्रेस की कोई हैसियत नहीं है। गठबंधन के नाम पर उसे अधिक सीटें देना हारने के बराबर है। 2021 में बिहार में तारापुर और कुशेश्वर स्थान विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था। इस चुनाव के दौरान कांग्रेस और राजद की लड़ाई इस सीमा तक पहुंच गयी थी कि आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग होने लगा था।
जब लालू यादव ने भक्तचरण दास को ‘भकचोन्हर’ कहा था – कुशेश्वर स्थान सीट पर राजद ने अपना उम्मीदवार पहले 0घोषित कर दिया था। कांग्रेस इसे अपनी परम्परागत सीट मानती थी। दावा खारिज होने के बाद कांग्रेस तिलमिला गयी। उस समय भक्तचरण दास बिहार में कांग्रेस के प्रभारी थे। उन्होंने राजद पर भाजपा के साथ समझौता करने का आरोप लगा दिया। यानी एक तरह से राजद को भी साम्प्रदायिक पार्टी कह दिया। भक्त चरण दास के इस बयान पर लालू यादव बेहद नाराज हुए। उन्होंने भक्तचरण दास को ‘भकचोन्हर’ कह दिया। इस शब्द के प्रयोग पर बहुत बड़ा बवाल हो गया था।