
नई दिल्ली: आज हम आपको इसरो के ऐसे दिग्गज स्पेस साइंटिस्ट के बारे में बताने जा रहे, जिन पर जासूसी करने और गद्दारी के झूठे आरोप लगाकर फंसाया गया था। इतना ही नहीं उन्हें पुलिस प्रताड़ना का भी शिकार होना पड़ा था। कई साल उन्हें जेल में गुजारनी पड़ी थी। हालांकि, उनकी काबिलियत का ही असर था कि एजेंसियों की जांच रिपोर्ट के बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने उन पर लगे सभी आरोपों को खारिज कर दिया। यही नहीं उन्हें 2019 में पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया। कैसे ‘पुलिसिया सिस्टम’ के जाल में फंस गए थे इसरो का होनहार साइंटिस्ट। जानिए उनके बारे में सबकुछ।
नंबी नारायणन की पूरी कहानी – हम बात कर रहे इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन की, जिन्हें मार्च 2019 वो सम्मान मिला जिसके वे हकदार थे। तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया था। नंबी नारायणन को जासूसी मामले में गलत तरीके से फंसाया गया था। यह मामला पहली बार 30 नंबर 1994 को सामने आया था। नंबी नारायणन ने 1970 के दशक की शुरुआत में भारत में लिक्विड फ्यूल रॉकेट तकनीक की शुरुआत की थी। उस समय, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की टीम सॉलिड मोटर पर काम कर रही थी।
बड़े स्पेस साइंटिस्ट में थे शुमार – नंबी नारायणन ने भविष्य के अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए लिक्विड-फ्यूल इंजन की जरूरत को समझा था। उन्हें तत्कालीन इसरो चेयरमैन सतीश धवन और उनके उत्तराधिकारी यूआर राव का भी प्रोत्साहन मिला था। 78 वर्षीय नंबी नारायणन भारत के अंतरिक्ष रॉकेटों का दिल कहे जाने वाले ‘विकास’ इंजन के मुख्य निर्माताओं में से एक थे। उन्होंने फ्रांसीसी सहायता से इस इंजन को विकसित करने में लगभग दो दशक लगाए।
‘विकास’ इंजन के मुख्य निर्माताओं में – इसी इंजन ने चंद्रयान-1 और मंगलयान जैसे अंतरग्रहीय मिशनों में इस्तेमाल होने वाले रॉकेटों को शक्ति दी थी। ‘विकास’ इंजन का इस्तेमाल PSLV के दूसरे चरण में और GSLV रॉकेट के दूसरे और चौथे स्ट्रैप-ऑन चरणों में होता है। 1994 में, केरल पुलिस ने नंबी नारायणन पर रॉकेट और सैटेलाइट लॉन्च के गोपनीय परीक्षण डेटा वाले राज्य के रहस्यों को बेचने का आरोप लगाया था। उन्हें उसी साल दिसंबर में गिरफ्तार किया गया और जासूसी के आरोप में फंसाया गया था। उन्हें यातनाएं भी दी गईं थी।
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