
इजरायल-अमेरिका गठबंधन के 28 फरवरी के ईरान पर हमले के बाद शुरू हुए युद्ध में अब तक कई तरह दावे सामने आए हैं। अमेरिका अपनी जीत की बात कह रहा है तो ईरान ने भी गठबंधन को काफी नुकसान किया है। इस सबके बीच एक्सपर्ट का कहना है कि दो हफ्ते की लड़ाई में चीन असली ‘विजेता’ बनकर उभरा है। चीन ने जिस तरह से इस युद्ध में सैटेलाइट तस्वीरें दुनिया के सामने रखी हैं, वह अमेरिका की स्पेस इंटेलिजेंस के वर्चस्व के अंत का इशारा है।
चीनी कमर्शियल सैटेलाइट लगातार ऐसी सैटेलाइट तस्वीरें जारी कर रहे हैं, जिनसे ईरानी हमलों के बाद खाड़ी देशों नें अमेरिकी सैन्य संपत्तियों और ठिकानों को नुकसान का पता चलता है। यह वैश्विक सैटेलाइट निगरानी के संतुलन में एक बड़े बदलाव को दिखाती है। यह सीधेतौर पर अमेरिकी अंतरिक्ष-आधारित खुफिया जानकारी के लंबे समय से चले आ रहे वर्चस्व को चुनौती है।
चीन जारी कर रहा है युद्ध की तस्वीरें – हालिया दिनों में खाड़ी देशों और इजरायल में नुकसान को दिखाने वाली तस्वीरें मुख्य रूप से चीनी सैटेलाइट नेटवर्क और जियोस्पेशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म से मिली हैं। दूसरी ओर एक प्रमुख अमेरिकी कमर्शियल सैटेलाइट इमेजिंग कंपनी ने कुछ तस्वीरों को जारी करने पर अस्थायी रोक लगा दी है।
चीनी कंपनियों ने सफलता के साथ अमेरिकी मिलिट्री ठिकानों को नुकसान दिखाने वाली सैटेलाइट तस्वीरें जारी की हैं। इस घटनाक्रम ने चीन के कमर्शियल अर्थ ऑब्जर्वेशन इंडस्ट्री के बढ़ते असर की ओर ध्यान खींचा है। यह इंडस्ट्री उन रेगुलेटरी और राजनीतिक पाबंदियों से बाहर काम करती है, जो पश्चिमी कंपनियों पर लागू होती हैं
चीन का सैटेलाइट नेटवर्क – ईरान युद्ध की ज्यादातर तस्वीरें चीन के बढ़ते अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट नेटवर्क से आई हैं। इस नेटवर्क में ‘चांग गुआंग सैटेलाइट टेक्नोलॉजी’ की ओर से संचालित ‘जिलिन-1’ सैटेलाइट समूह शामिल है। इस समूह में सौ से ज्यादा सैटेलाइट हैं, जो सब-मीटर रिजॉल्यूशन वाली तस्वीरें लेने और रणनीतिक महत्व वाले इलाकों की बार-बार निगरानी करने में सक्षम हैं।
रणनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ये घटनाक्रम मौजूदा संघर्ष से मिलने वाले सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी सबकों में से एक हैं। दशकों तक अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का कमर्शियल सैटेलाइट इमेजिंग बाजार पर दबदबा रहा। मैक्सर टेक्नोलॉजीज और प्लैनेट लैब्स जैसी कंपनियां ज्यादातर हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें उपलब्ध कराती रही हैं।
अमेरिकी दबदबे को चुनौती – हाल के घटनाक्रमों से पता चलता है कि चीन के कमर्शियल सैटेलाइटों का बढ़ता समूह अब इस दबदबे को कमजोर कर रहा है। चीन एक ऐसा समानांतर तंत्र तैयार कर रहा है, जो वैश्विक सैन्य गतिविधियों की स्वतंत्र रूप से निगरानी करने में सक्षम है। इससे सूचनाओं की भू-राजनीति में ढांचागत बदलाव आ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस घटनाक्रम से भविष्य के संघर्षों में पारदर्शिता का स्वरूप पूरी तरह से बदल सकता है। कई देश ऐसे बड़े सैटेलाइट समूह संचालित कर रहे हों, जो एक ही स्थान की बार-बार तस्वीरें लेने में सक्षम हों तो युद्धक्षेत्र की तस्वीरों के वैश्विक प्रवाह को नियंत्रित करने की किसी एक शक्ति की क्षमता कमजोर पड़ जाती है।
पश्चिम के हाथ से निकलती बात
एक्सपर्ट का यह कहना है कि मौजूदा संघर्ष का ‘सैटेलाइट पहलू’ यह साबित करता है कि अंतरिक्ष-आधारित निगरानी अब केवल पश्चिमी कंपनियों के एक छोटे से समूह का ही विशेष अधिकार क्षेत्र नहीं रह गया है। यह एक ऐसा प्रतिस्पर्धी मंच बनता जा रहा है, जहां चीन जैसी उभरती हुई शक्तियां युद्ध से जुड़ी वैश्विक चर्चाओं और धारणाओं को प्रभावित कर सकती हैं।
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