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कोलकाता के कालीबाड़ी मंदिर में पीएम मोदी ने यूंही नहीं की पूजा, समझिए बंगाल BJP की रणनीति


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कोलकाता में अपने रोडशो से पहले थंथनिया कालीबाड़ी में पूजा-अर्चना की। यह देवी काली के उन कुछ मंदिरों में से एक है जहां ‘प्रसाद’ के रूप में मांस चढ़ाया जाता है। राजनीतिक गलियारों में इसे मतदाताओं के लिए एक ज़ोरदार संकेत के तौर पर देखा गया। माना जा रहा है कि कालीबाड़ी जाने का मकसद TMC के इस प्रचार को गलत साबित करना था कि BJP एक ‘उत्तर भारतीय पार्टी’ है, जो पूरी तरह शाकाहारी है और बंगाल की मांसाहारी खान-पान की आदतों से तालमेल नहीं बिठा पाती।
थंथनिया कालीबाड़ी, जहां देवी की पूजा ‘मां सिद्धेश्वरी’ के रूप में की जाती है, कोलकाता के सबसे पुराने और सबसे ज़्यादा पूजनीय काली मंदिरों में से एक है। माना जाता है कि रामकृष्ण परमहंस अक्सर यहां आते थे और देवी के भजन गाते थे।
टीएमसी के आरोप का जवाब – पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने TMC की ओर से यह आरोप लगाया है कि अगर BJP सत्ता में आती है, तो वह राज्य के मांसाहारी खान-पान की आदतों पर रोक लगाने की कोशिश करेगी। ममता ने यह भी कहा कि बीजेपी बंगालियों की जगह उत्तर भारतीय राज्यों की प्रथाओं को लागू करेगी, जहां धार्मिक रूप से शुभ दिनों में मांसाहारी भोजन का सेवन अच्छा नहीं माना जाता।
बीजेपी नेता खा रहे मछली-मांस – BJP को ‘बाहरियों’ की पार्टी के तौर पर पेश करना, जो बंगाली मूल्यों से अनजान हैं, उनके राजनीतिक हमलों का मुख्य केंद्र रहा है। इस वजह से राष्ट्रीय पार्टी को इस धारणा को दूर करने के लिए मिलकर प्रयास करने पड़े हैं। BJP के पदाधिकारियों, जिनमें सांसद अनुराग ठाकुर भी शामिल हैं, ने बंगाल में अपने चुनाव प्रचार के दौरान ‘माछ-भात’ (मछली-चावल) खाते हुए अपनी तस्वीरें साझा की थीं।
पीएम मोदी का मंदिर के जरिए संदेश – पीएम मोदी खुद शाकाहारी हैं और नवरात्रि के दौरान उपवास रखते हैं। बीजेपी का मानना है कि उनके मंदिर का यह दैरा इस संदेश को लोगों तक पहुंचाने में सफल रहेगा कि बीजेपी मांसाहार के खिलाफ नहीं है।
300 साल पुराना मंदिर – थंथानिया कालीबाड़ी कोलकाता के सबसे पुरानी काली मंदिरों में से एक है। थंथानिया कालीबाड़ी मंदिर की स्थापना वर्ष 1703 में हुई थी। इसका 300 साल से भी पुराना इतिहास कोलकाता शहर के औपचारिक विकास से भी पहले का माना जाता है। इस मंदिर में मां काली की पूजा ‘मां सिद्धेश्वरी’ के रूप में की जाती है। यहां विराजमान देवी को ‘जागृत’ माना जाता है।
कालीबाड़ी में मांस चढ़ाने की परंपरा कैसे शुरू हुई? – यह भारत के उन चुनिंदा काली मंदिरों में से एक है, जहां मां काली को मांसाहारी प्रसाद चढ़ाया जाता है। कहा जाता है कि यह परंपरा रामकृष्ण परमहंस ने शुरू की थी। बताया जाता है कि उन्होंने ‘डाब-चिंगड़ी’ (नारियल और झींगा) का भोग मां सिद्धेश्वरी को अर्पित किया था और ब्रह्मानंद केशव चंद्र सेन के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना की थी। उसी दिन से मां काली को मांसाहारी प्रसाद चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी जारी है। यह भी कहा जाता है कि जब रामकृष्ण परमहंस श्यामपुकुर में बीमार पड़े थे, तब उनके अनुयायियों ने मां सिद्धेश्वरी से उनके जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थना की थी और देवी को मांसाहारी प्रसाद अर्पित किया था।