
सायकायट्रिस्ट (मनोचिकित्सक) के रूप में काम करने की वजह से मैंने रिश्ते खत्म होने, नौकरी छूटने, एग्जामिनेशन में फेल होने और बिजनेस ठप होने पर लोगों को बुरी तरह टूटते देखा है। मैंने जाना कि लोगों की असली समस्या ये स्थितियां नहीं होती, बल्कि इन स्थितियों से मन और दिमाग पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव होता है। फेलियर एक यूनिवर्सल फीलिंग है, जिसे हर मानव महसूस करता है, लेकिन इसके सायकोलॉजिकल असर पर किसी का ध्यान नहीं जाता और मुझे यही बात सबसे ज्यादा परेशान करती है। फेलियर के मायाजाल से निकलकर जिंदगी को वापस पटरी पर लाने के लिए इसका मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव और मन को संभालने का तरीका जानना जरूरी है।
फेलियर का दर्द होता है असली – मेडिकल नजरिए से फेलियर का सामना होने पर दिमाग में स्ट्रेस रेस्पॉन्स ट्रिगर होता है, जो शारीरिक दर्द के समान होता है। हमारे दिमाग के अंदर शारीरिक दर्द को प्रोसेस करने वाला एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स सोशल रिजेक्शन या पर्सनल फेलियर पर भी एक्टिवेट हो जाता है। इसलिए यह साइंटिफिकली और बायोलॉजिकली साबित हो चुका है कि फेलियर से दर्द का अनुभव होता है।
फेलियर से स्ट्रेस हॉर्मोन का बढ़ना – जब फेलियर होता है, तो शरीर कोर्टिसोल रिलीज करता है। यह प्राइमरी स्ट्रेस हॉर्मोन होता है और कम मात्रा में फायदेमंद होता है। बता दें कि यह फोकस बढ़ाने और मोटीवेशन के लिए उपयोगी होता है। हालांकि जब फेलियर से लंबे समय तक स्ट्रेस रहता है तो कोर्टिसोल लेवल असंतुलित बढ़ने से नींद बिगड़ जाती है, इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है, याददाश्त बिगड़ जाती है और एंग्जायटी व डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। जिन लोगों को पर्याप्त इमोशनल सपोर्ट के बिना लगातार फेलियर का सामना होता है, उनमें क्रोनिक स्ट्रेस डिसऑर्डर्स के लक्षण दिखाई देते हैं।
फेलियर से होने वाली निराशा का असर – फेलियर से जुड़ी निराशा का प्रभाव अलग होता है। यह दिमाग के एक्सपेक्टेड रिवार्ड पाथवे को बाधित कर देती है। जब आपका मनचाहा रिजल्ट नहीं आता तो डोपामाइन लेवल तेजी से गिरता है। तेजी से हुई यह गिरावट खालीपन, लो मोटीवेशन और गंभीर मामलों में नाउम्मीदगी का कारण बनती है। लंबे समय तक बार-बार होने वाली निराशा से दिमाग फेलियर की ही उम्मीद करने लगता है और यह एक चक्र बन जाता है, जिसे सचेत हस्तक्षेप के बिना तोड़ा नहीं जा सकता।
फेलियर से होने वाली मानसिक समस्याएं – क्लीनिकली रूप से मैंने फेलियर का सामना करने में परेशानी झेलने वाले लोगों में मानसिक समस्याएं देखी हैं। जैसे-
1. रुमिनेशन – इसमें व्यक्ति नेगेटिव इवेंट्स के बारे में बार-बार सोचने लगता है। इसकी वजह से दिमाग एक तनाव की स्थिति में बंध जाता है, जिससे इमोशनल रिकवरी नहीं हो पाती और समस्याओं को हल करने के लिए जरूरी कॉग्निटिव रिसोर्सेज की गलत खपत होने लगती है। यह भविष्य में आने वाले डिप्रेसिव एपिसोड का मजबूत संकेत है।
2. आत्म-सम्मान में कमी – कई लोग अपनी परफॉर्मेंस को अपनी पहचान से जोड़ लेते हैं। जब वो किसी चीज में फेलियर का सामना करते हैं तो वह इसे एक कोशिश के नाकाम होने की तरह ना देखकर एक व्यक्ति (खुद का) का नाकाम होना मान लेते हैं। इस कॉग्निटिव डिसटोर्शन को ओवरजनरलाइजेशन भी कहा जाता है, जो नुकसानदायक साबित होता है और इसमें सुधार करने की जरूरत पड़ती है। किसी एग्जाम में फेल होने से कोई अज्ञानी साबित नहीं होता और ना ही किसी रिश्ते के नाकाम होने से कोई प्यार के नाकाबिल नहीं बन जाता।
3. एवोइडेंस बिहेवियर – फेलियर के बाद दिमाग नाकाम कोशिशों को दर्द से जोड़कर देखने लगता है। इससे बचने के लिए वो ऐसी सभी स्थितियों से दूर रहने लगता है, जहां फेल होने का थोड़ा बहुत भी चांस हो। इस अप्रोच से कुछ वक्त के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन धीरे-धीरे इससे व्यक्ति की लाइफ प्रभावित होने लगती है। उसके जीवन में अकेलापन, ठहराव और लाचारी का एहसास आ सकता है।
फेलियर और निराशा में मन को कैसे संभालें? – मैं अपने मरीजों को नेगेटिव इमोशन को भूलने या नजरअंदाज करने की सलाह नहीं देती, बल्कि उनसे सोच-समझकर गुजरने के लिए कहती हूं। आपको निराशा और फेलियर से मन को संभालना आना चाहिए।
1. दुख और झुंझलाहट को दबाने से ये इमोशन खत्म नहीं हो जाते, बल्कि नजरअंदाजगी से गंभीर हो जाते हैं। निराशा को स्वीकार करने का खुद को मौका दें। अपनी फीलिंग्स को नाम दें। इमोशनल लेबलिंग करने से प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है और एमिग्डाला के शांत होने से इमोशन की गंभीरता कम हो जाती है।
2. खुद की आलोचना करने की बजाय आत्म-सहानुभूति का अभ्यास करें। कई रिसर्च ने माना है कि कोई व्यक्ति जिस तरह से दूसरे के फेल होने पर उससे सहानुभूति जताता है, अगर उसी तरह से खुद के साथ भी दोहराए तो वह हार से जल्दी उबर सकता है और दोबारा कोशिश में लग जाता है। दूसरी तरफ खुद के आलोचक बनने से कोर्टिसोल और इमोशनल तनाव बढ़ता है। खुद के लिए बेहद सख्त होना अनुशासन नहीं है, बल्कि यह एक तरह का साइकोलॉजिकल डैमेज है।
3. फेलियर के प्रति नजरिए को बदलें। यह एक क्लीनिकली सपोर्टेड कॉग्निटिव टेकनीक है। इसमें खुद से पूछें कि आपको इस फेलियर से क्या अनुभव मिला, इसने आपकी कौन-सी ताकत को उजागर किया और अपनी कोशिशों में कौन-से बदलाव की जरूरत को दिखाया। न्यूरोलॉजिकल रूप से इस तरीके से सोचने पर खतरे को प्रोसेस करने वाले एमिग्डाला एक्टिविटी की जगह फ्रंटल लोब एक्टिविटी चालू होती है, जो आपकी सोचने और निर्णय लेने की क्षमता को सुधारती है।
मदद लेना कमजोरी नहीं – कनेक्शन की मदद लें। अपने फेलियर के बारे में भरोसेमंद लोगों से बात करने पर अकेलापन दूर होता है। आपको एक नया नजरिया मिलता है और दूसरों की कहानियों से प्रेरणा भी मिलती है। अगर फेलियर की वजह से मूड में खराबी, नींद में बाधा, काम करने में दिक्कत होती है तो किसी मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल से बात करें। मदद लेना कमजोरी की निशानी नहीं है, बल्कि यह सबसे विवेकपूर्ण कदम हो सकता है। हमेशा ध्यान रखें कि फेलियर सफलता का विलोम शब्द नहीं है, बल्कि सफलता की प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा है।
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