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हर माता-पिता अपने बच्चों की बेहतर परवरिश में जी-जान लगा देते हैं। वे अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें अच्छी से अच्छी जिंदगी देने की

कई बार बच्चे गुस्से में माता-पिता से ऐसी बातें कह देते हैं, जो उन्हें गहराई से आहत कर देती हैं। इन्हीं में से एक बात यह है कि अपनी कोई छोटी सी ख्वाहिश पूरी न होने पर वे दूसरों के माता-पिता से तुलना करने लगते हैं।ऐसी तुलना से पेरेंट्स को बहुत ठेस पहुंचती है और वे सोचने लगते हैं कि आखिर उनसे कहां गलती हो रही है।
हर माता-पिता अपने बच्चों की बेहतर परवरिश में जी-जान लगा देते हैं। वे अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें अच्छी से अच्छी जिंदगी देने की कोशिश करते हैं। लेकिन कई बार यही बच्चे गुस्से या अनजाने में ऐसे शब्द बोल देते हैं, जो माता-पिता का कलेजा ही छलनी कर देते हैं। ऐसे ही शब्दों में से एक है- ‘खुद तो कुछ कर नहीं पाए’। बच्चों की यह बात न केवल माता-पिता को भावनात्मक रूप से आहत करती है, बल्कि रिश्तों में दूरी भी पैदा कर सकती है। इसलिए बच्चों को समझना चाहिए कि उनके ऐसे शब्दों का असर बहुत गहरा होता है और पेरेंट्स के साथ बातचीत हमेशा सम्मान और संवेदनशीलता के साथ होनी चाहिए।
1- खुद तो कुछ कर नहीं पाए – जाह‍िर सी बात है क‍ि माता-पिता ने बच्‍चों से ज्‍यादा दुन‍िया देखी होती है, इसलिए वे अपने अनुभव से बच्चों को पहले ही सर्तक करने की कोशिश करते हैं ताकि उन्हें आगे चलकर किसी परेशानी का सामना न करना पड़े। कोई गलत फैसला न ले लें। लेकिन कई बार बच्चों को बातें समझाने का यह तरीका चुभने लगता है और वे चिढ़ जाते हैं।गुस्से या झुंझलाहट में कभी-कभी बच्चे यहां तक कह देते हैं कि ‘आपने खुद क्या उखाड़ लिया है, जो मुझे बार-बार सलाह देते रहते हैं?’ खुद तो कुछ कर नहीं पाए। ऐसी बात सुनकर माता-पिता भी भावनात्मक रूप से आहत हो जाते हैं। बस यह सोचकर चुप हो जाते हैं क‍ि अगर उन्‍होंने कुछ कह द‍िया, तो बात और बिगड़ सकती है।
2-आपने हमारे लिए किया ही क्या है ? – बच्चे के जन्म से पहले ही माता-पिता उसके सुरक्षित भविष्य के लिए पैसे जोड़ना शुरू कर देते हैं, ताकि उसे बेहतर सुविधाएं मिल सकें, अच्छे स्कूल में पढ़ाया जा सके और जिस क्षेत्र में वह करियर बनाना चाहे, उसमें किसी तरह की आर्थिक कमी न आए।इसके बावजूद कई बार बच्चे गुस्से या नासमझी में कह देते हैं कि ‘आपने हमारे लिए किया ही क्या है?’ यह सुनकर पेरेंट्स अंदर से टूट जाते हैं। उन्हें अफसोस होता है कि उन्होंने अपनी जवानी के दिन बच्चों के भविष्य के लिए कितनी मेहनत और त्याग में गुजार दिए, और आज वही बच्चे ऐसी बातें कह देते हैं। हालांक‍ि, वे इस फील‍िंग्‍स को अपने मन में ही रखते हैं, क्‍योंक‍ि जानते हैं कहीं न कहीं कहने से कोई फायदा होगा नहीं।
3-दूसरे मम्मी-पापा कितने अच्छे हैं – बच्चों की एक और आदत अक्सर देखने को मिलती है कि जब उनकी कोई इच्छा माता-पिता किसी कारणवश पूरी नहीं कर पाते, तो वे दूसरों के माता-पिता से तुलना करने लगते हैं। वे कहते हैं कि ‘देखो उसके माता-पिता कितने अच्छे हैं, उसे तो महंगा फोन या इस कोर्स में एडमिशन दिला देते हैं, लेकिन आप लोग तो कुछ भी नहीं करते।’लेकिन बच्चे यह भूल जाते हैं कि जैसे उन्हें अपनी तुलना किसी और से किया जाना बुरा लगता है, वैसे ही माता-पिता को भी ऐसी तुलना सुनकर बहुत दुख होता है। हर पेरेंट्स की अपनी परिस्थितियां और सीमाएं होती हैं, जिन्हें समझना जरूरी है।
4- खुद तो कभी ज‍िंदगी जी नहीं – आजकल लोग ‘आज काे जीने’ के विचार में ज्यादा यकीन करने लगे हैं। इसी वजह से कई बार नई नौकरी लगने के बाद युवा अपनी पूरी सैलरी घूमने-फिरने और खाने-पीने पर खर्च कर देते हैं।ऐसे खर्चे देखकर जब माता-पिता उन्हें सोच-समझकर पैसे बचाने की सलाह देते हैं, तो कई बार बच्चे जवाब में कह देते हैं कि ‘आपने तो कभी जिंदगी जी ही नहीं, बस हमेशा एक-एक पैसा जोड़ते रहे, और अब हमें समझा रहे हैं कि कैसे जीना चाहिए।’ यह बात भी पेरेंट्स का द‍िल तोड़ देती है, उन्‍हें लगता है क‍ि वे तो उसका भला ही चाहते हैं, लेक‍िन इसके जवाब तो देखो।
5- अब वो जमाना नहीं रहा – यह सच है कि आज जमाना बदल चुका है और AI के दौर में चीज़ें बहुत तेजी से बदल रही हैं, लेकिन इसके बावजूद संस्कार, रीत‍ि-र‍िवा और नैतिक मूल्यों की अहमियत आज भी उतनी ही बनी हुई है।
हालांकि, यही अहमियत जब माता-पिता बच्चों को समझाने की कोशिश करते हैं, तो कई बार बच्चे उसे पुराने जमाने की सोच मानकर नजरअंदाज कर देते हैं या बहस करने लगते हैं। इससे पेरेंट्स कहीं न कहीं फ‍िर कुछ समय के बाद कहना छोड़ देते हैं।