
चीन बहुत रणनीतिक तरीके से अरब जगत के हथियार बाजार में अपने पैर पसार रहा है। इसके लिए वह पाकिस्तान को मोहरा बना रहा है और उन देशों तक पहुंच रहा है, जो अमेरिका के बहुत करीबी सहयोगी हैं। इससे पश्चिम एशिया की सुरक्षा में एक बड़ा बदलाव हो रहा है, जिसकी बहुत कम चर्चा हालिया समय में देखी गई है। इसमें सऊदी अरब में JF-17 फाइटर जेट की तैनाती तक शामिल है, जिसे पाकिस्तान और चीन ने मिलकर बनाया है।
सितंबर 2025 में रक्षा समझौते के बाद पाकिस्तान ने JF-17 फाइटर जेट, सैनिक और रक्षा उपकरण सऊदी अरब भेजे थे। यह अरब की जमीन पर चीनी सैन्य हथियारों का लाइव-फायर प्रदर्शन था। यह उदाहरण दिखाता है कि पाकिस्तान कैसे पश्चिम एशिया में सैन्य विस्तार के लिए चीन का ‘रास्ता’ बन गया है।
पाकिस्तान का फायदा उठा रहा चीन – चीन ने पश्चिम एशिया में सीधे हथियार बेचने के बजाय पाकिस्तान का इस्तेमाल ‘वाइट-लेबल’ प्रमोटर के तौर पर किया है। वह खाड़ी देशों के साथ पाकिस्तान के गहरे संबंधों का फायदा उठाकर चीनी रक्षा प्रणालियों को उस क्षेत्र में पहुंचाता है, जहां ऐतिहासिक रूप से पश्चिम का दबदबा रहा है।
चीन ने पाकिस्तान का इस्तेमाल करके इराक, इंडोनेशिया, सऊदी अरब, नाइजीरिया, मोरक्को, लीबिया, बांग्लादेश, सूडान और इथियोपिया जैसे देशों के साथ JF-17 फाइटर जेट, HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम और हथियारबंद ड्रोन बेचने के सौदे किए है। पाकिस्तान इसमें भूमिका निभाता है, जिससे चीन भूराजनीतिक तनाव से बच जाता है।
लीबिया में दिखी चीन की चाल – पाकिस्तान को कैसे चीन ने मोहरा बना रखा है, इसका उदाहरण हाल ही में हुआ 4 अरब डॉलर का रक्षा सौदा है। इस सौदे में पाकिस्तान ने लीबियाई नेशनल आर्मी को 16 JF-17 और ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट दिए। इससे चीन को सीधेतौर पर लीबिया में सैन्य संतुलन को बदलने और अपनी पहुंच बढ़ाने में मदद मिली। वहीं पाकिस्तान ने संभावित अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना किया।
हालांकि सऊदी प्रस्तावित समझौता सफल नहीं हो सका। इसमें पाकिस्तान को सऊदी अरब को JF-17 देने थे, जिसके बदले में उसे वित्तीय मदद (2 अरब डॉलर का लोन) मिलनी थी। यह सौदा कई वजहों से पूरा नहीं हो सका। इसका मुख्य कारण चीनी हथियारों की गुणवत्ता, सऊदी अरब के मौजूदा अमेरिकी सिस्टम के साथ उनके तालमेल और वित्तीय चिंताएं थीं।
चीन-पाकिस्तान का रिश्ता – खाड़ी देशों ने अभी तक चीनी सिस्टम खरीदने में हिचकिचाहट दिखाई है लेकिन अमेरिकी सुरक्षा पर घटते भरोसे के चलते वह अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं का फिर से आकलन कर रहे हैं। ऐसे में चीन ही उसके सामने एक बड़ा विकल्प बन रहा है। इसमें ‘भरोसेमंद मध्यस्थ’ के तौर पर पाकिस्तान की भूमिका अहम है।
यह समझने के लिए कि पाकिस्तान यह जरिया कैसे बना, चीन के साथ उसके सैन्य एकीकरण की गहराई को देखना होगा। USIP की एक अहम रिपोर्ट इसे सामान्य साझेदारी नहीं बल्कि थ्रेशोल्ड अलायंस बताती है। इसका मतलब है कि युद्ध के समय संयुक्त अभियानों के लिए जरूरी सामान और तकनीकी व्यवस्था पहले से ही मौजूद है।
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