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जानवरों पर प्रयोग की प्रक्रिया आसान बनाने का प्रस्ताव, मेनका गांधी के कार्यकाल वाली केंद्रीय समिति के पर कतरने की तैयारी


सरकार ने जानवरों पर होने वाले प्रयोगों से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव का प्रस्ताव रखा है। इसका मकसद अकादमिक और शोध संस्थाओं के साथ-साथ फार्मा और बायोमेडिकल इंडस्ट्री के लिए मंजूरी की प्रक्रिया को तेज करना है, ताकि मेनका गांधी के समय से चली आ रही केंद्रीय निगरानी को कम किया जा सके।
इस मसौदे में एक बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। इसके तहत, ‘सेंट्रल कंट्रोल एंड सुपरविजन ऑफ एक्सपेरिमेंट्स ऑन एनिमल्स’ (CCSEA) कमेटी से मंजूरी लेने के बजाय, रजिस्टर्ड इंस्टीट्यूशनल एथिक्स पैनल ज़्यादातर प्रयोगों को मंजूरी दे सकेंगे।
मसौदे में जानवरों को होने वाले दर्द की गंभीरता के आधार पर मंजूरी की एक नई, ग्लोबल स्तर की चार-स्तरीय व्यवस्था का प्रस्ताव भी है। अभी जानवरों के शारीरिक आकार के आधार पर वर्गीकरण होता है। प्रस्तावित नियमों के अनुसार, केंद्रीय निगरानी मुख्य रूप से सबसे ऊपरी स्तर के, यानी गंभीर दर्द वाले प्रयोगों तक ही सीमित रहेगी।
नियमों को आसान बनाना मकसद – मसौदा नियमों का मकसद दो पुराने नियमों ‘द एक्सपेरिमेंट्स ऑन एनिमल्स (कंट्रोल एंड सुपरविजन) रूल्स, 1968’ और ‘द ब्रीडिंग ऑफ़ एंड एक्सपेरिमेंट्स ऑन एनिमल्स (कंट्रोल एंड सुपरविज़न) रूल्स, 1998’ को आसान बनाना है। 1998 वाले नियम तब लाए गए थे जब तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी CCSEA (तब CPCSEA के नाम से जाना जाता था) की अध्यक्षता कर रही थीं।
विवादास्पद अधिकार पर सवाल – 1998 के नियमों ने कमेटी को कुछ विवादास्पद अधिकार दिए थे, जैसे बायोमेडिकल रिसर्च सुविधाओं का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, नए नैतिक मानक, बिना सूचना के निरीक्षण का प्रावधान, स्कूलों में जानवरों के विच्छेदन पर रोक आदि। इन नियमों का काफी विरोध हुआ था।
अब, ड्राफ्ट नियमों में डीरेगुलेशन और ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ के नजरिए से कुछ पुराने नियमों को बदलने की कोशिश की गई है। यह कदम तब उठाया गया जब प्रमुख वैज्ञानिक और बायोमेडिकल संस्थानों और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने शिकायत की कि CCSEA से मंज़ूरी मिलने में देरी होती है, भले ही प्रयोग छोटे स्तर के हों।
पुराने नियम में क्या है व्यवस्था – अभी, ‘इंस्टीट्यूशनल एनिमल एथिक्स कमेटी’ (IAEC) को केवल छोटे जानवरों जैसे कृंतक, चूहे, पक्षी और खरगोश पर होने वाले प्रयोगों को मंज़ूरी देने का अधिकार है।
कुत्तों, बकरियों, सूअरों, मवेशियों और बंदरों जैसे बड़े जानवरों पर होने वाले प्रयोगों के लिए CCSEA से मंज़ूरी लेनी पड़ती है।
मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय द्वारा जारी ‘पशु क्रूरता निवारण (प्रयोगशाला पशुओं के प्रयोग, प्रजनन और व्यापार का नियंत्रण और निगरानी) नियम, 2026’ का ड्राफ्ट अब प्रयोगों का एक नया जोखिम-आधारित वर्गीकरण प्रस्तावित करता है।
इसका मकसद यह तय करना है कि किसी खास पशु प्रयोग के लिए CCSEA की मंज़ूरी ज़रूरी है या इसे रजिस्टर्ड IAEC के ज़रिए संस्थान के स्तर पर ही निपटाया जा सकता है।