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आज आधी रात को आसमान पर रखें निगाहें, ताबड़तोड़ गुजरेंगे Leonid उल्कापिंड


ऐस्ट्रोनॉमर्स और स्काईवॉचर्स के लिए 17 नवंबर की रात से लेकर 19 नवंबर तक आसमान का नजारा दिल थाम देने वाला होगा। दरअसल, इस महीने दो-दो Meteor Shower यानी उल्कापिंडों की बारिश होनी है जिसमें से एक Leonid Meteor Shower इन दिनों होने वाला है। आसमान से टूटकर गिरते तारे जो अद्भुत नजारे बनाने वाले हैं, उन्हें लेकर ऐस्ट्रोनॉमर्स बेहद उत्साहित हैं।
कहां से आते हैं Leonid : Leonid इसी नवंबर के पहले हफ्ते में ऐक्टिव हो चुके हैं और इस महीने के आखिर में ये जारी रहेंगे। यह Comet 55P/Tempel-Tuttle से आते हैं और सदियों से बड़ी संख्या में टूटते तारे इस दौरान आसमान रोशन करते हैं। कई बार एक घंटे में सैकड़ों तारे देखे जा सकते हैं। हालांकि, अमेरिकन मीटियर सोसायटी (AMS) का कहना है कि ऐसा मुश्किल है कि ऐसी भारी बारिश हमें अपने जीवन में देखने को मिलें। हो सकता है कि साल 2030 में ऐसी बारिश मिले।
कैसे देखे जा सकते हैं : भारत में 17 नवंबर को आधी रात के बाद इन्हें आसमान साफ होने पर देखा जा सकेग। हालांकि, बादल या ज्यादा रोशनी में इन्हें देखना मुश्किल होगा। जमीन पर लेटकर देखने से ज्यादा तारों को देखे जाने की संभावना रहेगी। तारामंडल Leo की दिशा से आने से इन्हें देखा जा सकेगा।
27 मार्च को खोजा गया Comet Neowise (C/2020 F3) 3 जुलाई को सबसे पहले सूरज के सबसे करीब आया था। उसके बाद काफी वक्त तक शाम को ही दिखाई दिया। उत्तरी गोलार्ध में धीरे-धीरे आसमान में ऊपर बढ़ने लगा और अब आखिरकार यह इनर सोलर सिस्टम को छोड़कर जा चुका है। अब यह 6,800 साल बाद भी लौटेगा। हालांकि, सिर्फ यही एक बात नहीं है जिसकी वजह से Comet Neowise खास है। यह भी दूसरे धूमकेतुओं की तरह बर्फ, चट्टानों और धूल से बना है और सूरज का चक्कर काट रहा है। सूरज के करीब आने से इनके गैस और धूल और इलेक्ट्रिक चार्ज पूंछ की तरह दिखने लगते हैं। Neowise क्यों खास है, आइए जानते हैं-
इसकी सबसे खास बात यह रही है कि आम लोगों के लिए बिना दूरबीन या किसी अडवांस्ड इंस्ट्रूमेंट के भी इसे देखना मुमकिन था। जिनके पास आम दूरबीन या छोटे टेलिस्कोप थे, उन्हें यह ज्यादा साफ दिखा। यह इतना चमकदार था कि वैज्ञानिक दूसरे धमूकेतुओं की तुलना में कहीं ज्यादा डेटा इकट्ठा कर सके। वैज्ञानिकों ने अलग-अलग उपकरणों की मदद से बेहतर ढंग से स्टडी किया।

जॉन निकोटेरा अपनी गर्लफ्रेंड को शादी के लिए प्रपोज करने वाले थे और उन्होंने इस पल को और यादगार बना लिया। उन्होंने ठीक उस वक्त गर्लफ्रेंड एरिका ली को प्रपोज किया जब पीछे से Neowise गुजर रहा था। दोनों अपने एक दोस्त के साथ धूमकेतु को ही देखने गए थे लेकिन तभी जॉन को यह आइडिया आया और उन्होंने यह काम कर डाला।

इसकी एक ओर दिलचस्प बात है इसपर मौजूद पानी। NASA की Jet Propulsion Laboratory में NEOWISE (Near-Earth Object Wide-field Infrared Survey Explorer) में साइंस टीम को-ऑर्डिनेटर एमिली क्रैमर का कहना है, ‘Comet Neowise में 1.3 करोड़ ओलंपिक स्विमिंग पूल जितना पानी है।’

डायमीटर में Neowise 3 मील चौड़ा है जो अपने आप में तो काफी बड़ा है लेकिन वैसे एक औसत आकार का धूमकेतु है। हालांकि, क्रैमर का कहना है, ‘इस साइज के धूमकेतु तो कई हैं लेकिन वे इतने चमकदार नहीं होते। वे सूरज और पृथ्वी से इतने दूर हैं कि उस तरह से नहीं दिखते जैसे Comet Neowise दिखा।’

Neowise की कक्षा अंडाकार है। अभी यह 40 मील प्रति सेकंड की रफ्तार से बढ़ रहा है लेकिन जैसे-जैसे यह अपनी कक्षा में सूरज से सबसे दूर पहुंचेगा, इसकी स्पीड कम हो जाएगी। फिर यह वापस इनर सोलर सिस्टम में आ जाएगा और सूरज की ओर बढ़ते वक्त इसकी स्पीड बढ़ जाएगी। अभी यह बाहरी सोलर सिस्टम में जा रहा है। 6,800-7,000 साल में सूरज का एक चक्कर पूरा करता है और अभी धरती से करोड़ मील दूर है। इसलिए धरती को इससे को खतरा भी नहीं है।

क्या होते हैं उल्कापिंड? उल्कापिंड ऐस्टरॉइड का ही हिस्सा होते हैं। किसी वजह से ऐस्टरॉइड के टूटने पर उनका छोटा सा टुकड़ा उनसे अलग हो जाता है जिसे उल्कापिंड यानी meteroid कहते हैं। जब ये उल्कापिंड धरती के करीब पहुंचते हैं तो वायुमंडल के संपर्क में आने के साथ ये जल उठते हैं और हमें दिखाई देती एक रोशनी जो शूटिंग स्टार यानी टूटते तारे की तरह लगती है लेकिन ये वाकई में तारे नहीं होते। और ये Comet यानी धूमकेतु भी नहीं होते।
क्या होते हैं Comet? आपको बता दें कि धूमकेतु भी (Asteroids) की तरह सूरज का चक्कर काटते हैं लेकिन वे चट्टानी नहीं होते बल्कि धूल और बर्फ से बने होते हैं। जब ये धूमकेतु सूरज की तरफ बढ़ते हैं तो इनकी बर्फ और धूल वेपर यानी भाप में बदलते हैं जो हमें पूंछ की तरह दिखता है। खास बात ये है कि धरती से दिखाई देने वाला कॉमट दरअसल हमसे बेहद दूर होता है।