
म्यांमार की सेना ने घोषणा की है कि वह सोमवार को घोषित एक साल के आपातकाल के बाद देश में नए सिरे से चुनाव कराएगी। म्यांमार की सेना ने सोमवार को तख्तापलट के बाद देश की शीर्ष नेता आंग सान सू की को हिरासत में ले लिया था। सेना के नियंत्रण वाले ‘मयावाडी टीवी’ पर यह घोषणा की गई। इससे पहले सैन्य नियंत्रण वाले इस टीवी चैनल पर कहा गया था कि राष्ट्रीय स्थिरता क्योंकि बाधित है इसलिये सभी सरकारी कामकाज सेना प्रमुख जनरल मिन आंग लाइंग को स्थानांतरित किये जाते हैं।
यह कदम 2008 के संविधान के प्रावधान के तहत उठाया गया जिसे सैन्य शासन के दौरान जारी किया गया था। घोषणा में कहा गया है कि एक बार चुनाव होने के बाद सेना जीतने वाले को सत्ता की बागडोर सौंप देगी। सू ची की नेशनल लीग ऑफ डेमोक्रेसी पार्टी ने पिछले साल नवंबर में हुए आम चुनाव में शानदार जीत दर्ज की थी। उस चुनाव में सेना के समर्थन वाली यूनियन सॉलिडेरटी एंड डेवलपमेंट पार्टी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी।
‘सरकार चुनावों में धांधली के आरोपों का निराकरण करने में नाकाम रही’ : सेना ने कहा, ‘उसे यह कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि सू की की सरकार बड़े पैमाने पर चुनावों में धांधली के उसके आरोपों का निराकरण करने में नाकाम रही।’ इस बीच म्यांमार की स्टेट काउंसलर और नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की के सियासी दल NLD ने देश के लोगों से सोमवार के ‘तख्तापलट’ और ‘सैन्य तानाशाही’ कायम करने के प्रयासों का विरोध करने का आह्वान किया है।
म्यांमार की सेना के कमांडर इन चीफ जनरल मिन ने कुछ दिनों पहले ही संकेत दिया था कि अगर चुनाव में धोखाधड़ी से जुड़ी उनकी मांगों को नहीं माना गया तो वह सैन्य तख्तापलट कर देंगे। सेना ने आरोप लगाया था कि पिछले साल नवंबर में हुए चुनाव में व्यापक पैमाने पर धोखाधड़ी हुई जिसमें आंग सांग सू की को भारी बहुमत मिला था। जनरल मिन ने सेना के अखबार मयावाडी में छपे अपने बयान में आंग सांग सू की सरकार को कड़ी चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि वर्ष 2008 का संविधान सभी कानूनों के लिए ‘मदर लॉ’ है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए। जनरल मिन ने कहा, ‘कुछ परिस्थितियों में यह आवश्यक हो सकता है कि इस संविधान को रद्द कर दिया जाए।’ सेना का दावा है कि चुनाव में देशभर में चुनाव धोखाधड़ी के 86 लाख मामले सामने आए हैं। यह चुनाव वर्ष 2011 में करीब 5 दशक तक चले सैन्य शासन के बाद लोकतंत्र के बहाल होने पर दूसरी बार हुए थे। चुनाव विवाद के बीच सेना के समर्थन में देश के कई बड़े शहरों में प्रदर्शन भी हुए थे।
म्यांमार की सेना के कमांडर इन चीफ जनरल मिन पर सेना के जरिए रोहिंग्या मुस्लिमों के कत्लेआम के आरोप लगते रहे हैं। म्यांमार की सेना ने अगस्त 2017 में रखाइन प्रांत में खूनी अभियान चलाया था और इसमें कई रोहिंग्या मुस्लिम मारे गए थे। यही नहीं 5 लाख रोहिंग्या मुस्लिमों को देश छोड़कर पड़ोसी बांग्लादेश और अन्य देशों में भागना पड़ा था। इस दौरान म्यांमार की सेना पर रोहिंग्या मुस्लिमों को गोली मारने और धारदार हथियार से उनकी हत्या करने का आरोप लगा था। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि म्यांमार की सेना ने रोहिंग्या मुस्लिमों को उनके घरों में बंद करके उसे आग लगा दी थी। यही नहीं जनरल मिन के नेतृत्व वाली म्यांमार की सेना पर रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के साथ गैंगरेप करने और यौन हिंसा का आरोप लगा था और इसके कई सबूत भी दिए गए थे। रोहिंग्या मुस्लिमों पर अत्याचार के दौरान नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सांग सू की ने चुप्पी साधे रखी जिससे उनकी दुनियाभर में आलोचना हुई थी।
64 साल के जनरल मिन के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत कम बोलते हैं और पर्दे के पीछे से रहकर काम करना पसंद करते हैं। उन्होंने यंगून यूनिवर्सिटी से 1972 से 1974 के बीच कानून की पढ़ाई की है। जनरल मिन ने वर्ष 2011 से सेना को संभाला और उसी समय म्यांमार लोकतंत्र की ओर आगे बढ़ा। यंगून में मौजूद राजनयिकों का कहना है कि आंग सांग सू की के पहले कार्यकाल के अंतिम दिनों के दौरान वर्ष 2016 में जनरल मिन ने खुद को एक सैनिक से एक राजनेता और सार्वजनिक व्यक्ति के रूप में बदल लिया। पर्यवेक्षकों का मानना है कि फेसबुक के जरिए अपनी गतिविधियों का प्रचार प्रसार करना इसी प्रयास का हिस्सा है। फेसबुक पर उनके प्रोफाइल को बंद किए जाने से पहले वर्ष 2017 तक लाखों लोगों ने उनके प्रोफाइल को फॉलो किया था। रोहिंग्या मुस्लिमों पर अत्याचार के बाद उनके प्रोफाइल को फेसबुक ने बंद कर दिया था। उन्होंने संसद की 25 फीसदी सीटों पर सेना के कब्जे और आंग सांग सू की के राष्ट्रपति बनने से रोक वाले कानून पर कोई समझौता नहीं किया। आंग सांग सू की के पति विदेशी नागरिक हैं और इसी वजह से वह राष्ट्रपति नहीं बन पाईं।
म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद अब सबकी नजरें जनरल मिन पर टिक गई हैं। सू ची की पार्टी ने संसद के निचले और ऊपरी सदन की कुल 476 सीटों में से 396 पर जीत दर्ज की थी जो बहुमत के आंकड़े 322 से कहीं अधिक था। लेकिन वर्ष 2008 में सेना द्वारा तैयार किए गए संविधान के तहत कुल सीटों में 25 प्रतिशत सीटें सेना को दी गयी हैं जो संवैधानिक बदलावों को रोकने के लिए काफी है। कई अहम मंत्री पदों को भी सैन्य नियुक्तियों के लिए सुरक्षित रखा गया है। सू ची देश की सबसे अधिक प्रभावशाली नेता हैं और देश में सैन्य शासन के खिलाफ दशकों तक चले अहिंसक संघर्ष के बाद वह देश की नेता बनीं। म्यामां में सेना को टेटमदॉ के नाम से जाना जाता है। सेना ने चुनाव में धोखाधड़ी का आरोप लगाया, हालांकि वह इसके सबूत देने में नाकाम रही। देश के स्टेट यूनियन इलेक्शन कमीशन ने पिछले सप्ताह सेना के आरोपों को खारिज कर दिया था।
नैशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) ने पार्टी प्रमुख सू ची के फेसबुक पेज पर एक बयान जारी कर कहा है कि सेना के कदम अन्यायपूर्ण हैं और मतदाताओं की इच्छा एवं संविधान के विपरीत हैं। यह पुष्टि करना अभी संभव नहीं है कि फेसबुक पेज पर यह संदेश किसने डाला है क्योंकि पार्टी के सदस्य फोन कॉल का जवाब नहीं दे रहे हैं। हाल के वर्षों में म्यांमार में लोकतंत्र कायम करने की दिशा में आंशिक लेकिन अहम प्रगति हुई थी लेकिन आज हुए तख्तापलट से इस प्रक्रिया को खासा झटका लगा है। सू ची के लिए तो यह और भी बड़ा झटका है जिन्होंने लोकतंत्र की मांग को लेकर वर्षों तक संघर्ष किया, वर्षों तक वह नजरबंद रहीं और अपने प्रयासों के लिए उन्हें नोबल शांति पुरस्कार भी मिला।
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