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Coronavirus पर टॉप डॉक्टर ऐंथनी फाउची की चेतावनी, वैक्सिनेशन के बिना अमेरिका में हावी होगा भारत में मिला

अमेरिका के टॉप डॉक्टर और राष्ट्रपति जो बाइडेन के चीफ मेडिकल अडवाइजर ऐंथनी फाउची का कहना है कि अगर देश में लोग पूरी तरह वैक्सिनेटेड नहीं हुए, तो कोरोना वायरस का डेल्टा वेरियंट यहां भारी पड़ सकता है। फाउची ने कहा है कि ब्रिटेन में डेल्टा वेरियंट तेजी से फैल रहा है और सबसे ज्यादा संक्रामक साबित हो रहा है। इसने अल्फा वेरियंट की जगह ले ली है। ‘डेल्टा’ भारत में मिले
फाउची का कहना है कि अमेरिका में ऐसा नहीं होने दिया जा सकता है। अमेरिका में डेल्टा वेरियंट के 6% मामले मिले हैं और ब्रिटेन में 60%। फाउची का कहना है कि हर टेस्ट को सीक्वेंस नहीं किया जाता है, इसलिए यह संख्या और ज्यादा होने की आशंका है। ब्रिटेन में ज्यादातर 12-22 साल के उम्र के लोग इसके शिकार हो रहे हैं।
वैक्सीन निर्माता अक्सर उम्मीद करते हैं कि बीमारी से बचने के अलावा उनके वैक्सीन स्टेराइल इम्युनिटी (Sterile Immunity) हासिल करेंगे। Sterile Immunity का मतलब है कि वैक्सीन लगवा चुका शख्स कभी वायरस के संपर्क में नहीं आएगा या न ही इसका आगे प्रसार करेगा।
उदाहरण के तौर पर हम पोलियो की वैक्सीन को ले लें,जिससे काफी हद तक इस बीमारी को समाप्त कर दिया है। हम सभी जानते हैं कि अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में पोलियो की भयानक बीमारी खत्म होने की कगार पर है। लेकिन जिन्हें इसका टीका नहीं लग पाया है वे अब भी इस रोग से ग्रसित हैं।
यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक पेपर के अनुसार, वैक्सीन लगने के बाद पोलियो वायरस आंतों के मार्ग से होते हुए मल में बह जाता है। लेकिन इसके बाद ये पूरी तरह से नष्ट नहीं होता बल्कि विषाक्त रूप में आता है। वहीं, ऐसी भी रिपोर्ट्स आई हैं कि पोलियो की दवा वायरस को मनुष्य के शरीर में बढ़ने से पूरी तरह नहीं रोकती लेकिन यह इस बीमारी की रोकथाम में अत्यधिक प्रभावी है। क्योंकि इससे ऐसी एंटीबॉडी बनती हैं जो वायरस को मस्तिष्क और मेरुदण्ड (Spine) को संक्रमित करने से रोकते हैं।
यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड कम्युनिकेबल डिजीज (Disease Control and Prevention) ने हाल ही में मास्क पहनने के बारे में अपने दिशा-निर्देशों में बदलाव किए तो लोगों के जेहन में तमाम तरह के सवाल उठने लगे। जैसे जिन लोगों को पहले ही COVID-19 का टीका लग चुका है, उनमें से कितने सुरक्षित या असुरक्षित हैं? क्या टीका लगवा चुके दूसरे से संक्रमित होंगे? जिनके शरीर में mRNA वैक्सीन (फाइजर-बायोटेक और मॉडर्न) का डोज पहुंच चुका है उनके संक्रमित होने और दूसरों तक संक्रमण फैलाने की संभावना कम होती है।
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जॉनसन एंड जॉनसन/जेनसेन वैक्सीन के लाभों के बारे में अधिक जानने के लिए अध्ययन चल रहे हैं। हालांकि, शोध ये भी कहता है कि जब तक कि वायरस का कम्युनिटी ट्रांसमिशन जारी है तब टीकाकरण कराने के बाद भी SARS-CoV-2 संक्रमण के जोखिम को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता है।
स्टडी के अनुसार, वर्तमान में इम्युनो कॉम्प्रोमाइज यानी जिनके इम्यून सिस्टम कमजोर हैं उनके टीके की प्रभावशीलता पर सीमित डेटा है। अध्ययनों में पाया गया कि टीके की पहली खुराक लेने के बाद कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए लोगों में बिना टीका लगवाए संक्रमित पाए मरीजों की तुलना में शरीर में विषाणु का स्तर कम पाया गया।
आपको बता दें कि यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने 13 मई, 2021 को मास्क पहनने के बारे में अपने दिशा-निर्देशों में बदलाव कर घोषणा की कि जो कोई भी वैक्सीन की पूरी डोज ले चुका है वह बिना मास्क पहने बाहरबाहल निकल सकता है। साथ ही वह छोटी-बड़ी इनडोरइंडोर और आउटडोर एक्टिविटीज में भी भाग ले सकता है।
इम्यूनोलॉजी एक्सपर्ट्स कहता है कि संक्रामक रोग के खिलाफ रक्षा करने वाली वाले वैक्सीन वायरस को फैलाने की दर भी कम करेंगी। लेकिन यह पता लगाना निश्चित तौर पर मुश्किल है कि क्या टीका लगवा चुका व्यक्ति इस वायरस को नहीं फैला रहा है। कोविड-19 एक खास चुनौती पेश करता है क्योंकि बिना लक्षण वाले मरीज (asymptomatic) भी बीमारी फैला सकते हैं। ऐसे में उनके संपर्क में आए लोगों का उचित तरीके से पता न लगाने और जांच न होने का मतलब है कि बिना लक्षण वाले मरीजों की पहचान करना मुश्किल है।
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, एक अध्ययन में पाया गया कि मॉडर्ना का एमआरएनए कोविड-19 रोधी टीका मुंह और नाक के द्रव्य में कोरोना वायरस से लड़ने वाले एंटीबॉडी पैदा कर सकता है। ये एंटीबॉडी विषाणु को शरीर में घुसने से रोक देंगे। इसका मतलब होगा कि टीका लगवा चुका व्यक्ति श्वास लेने के समय गिरने वाली बूंदों से वायरस नहीं फैलाएगा। तो क्या वैक्सीनेट हो चुके लोग श्वसन की बूंदों के माध्यम से वायरस नहीं फैला सकेंगे। हालांकि, इस पर अभी स्टडी जारी है।
दोनों खुराकें जरूर लें : फाउची ने अमेरिका के लोगों से अपील की है कि इससे बचने के लिए वैक्सीन लगवाएं। उन्होंने बताया है कि पहली डोज लेने के बाद दूसरी डोज जरूर लें। अभी अमेरिका में ब्रिटेन में पाया जाने वाला अल्फा वेरियंट फैला है। डेल्टा वेरियंट कम से कम 60 देशों में फैल चुका है और इसमें ज्यादा म्यूटेशन हैं। यह ऐंटीबॉडी रिस्पॉन्स से बच सकता है। ऐसे में एक डोज से ज्यादा सुरक्षा की संभावना कम है।
डॉ. जोसेफ के मुताबिक कोरोना वायरस के खिलाफ सुरक्षित और असरदार वैक्सीन लगवाने के फायदे, कोविड-19 के कारण होने वाली मौत या किसी लंबे वक्त तक रहने वाली परेशानी, जिसमें खून के थक्के शामिल हैं, उससे कहीं ज्यादा हैं। यह वैक्सीन adenovirus से बनाई गई है जिसे SARS-CoV-2 जैसा प्रोटीन बनाने के लिए मॉडिफाई किया गया है। वैक्सीन में कोरोना वायरस नहीं है और इसकी वजह से कोविड-19 नहीं हो सकता है।
EMA ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि ब्लड क्लॉट और कम प्लेटलेट को इस वैक्सीन का बहुत दुर्लभ साइड इफेक्ट माना जा सकता है। EMA ने इसके लिए वैक्सिनेशन के दो हफ्ते के अंदर सतर्क रहने की बात बताई थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि खून के थक्के जमना और उसी के साथ प्लेटलेट भी कम होना बहुत दुर्लभ स्थिति है और वैक्सीन लगवाने के फायदे साइड इफेक्ट से ज्यादा हैं।
ये क्यों होते हैं, इसके लिए और स्टडी की जरूरत बताई गई लेकिन एक संभावना यह है कि इम्यून रिस्पॉन्स के ट्रिगर होने से ऐसा हो सकता है। बेकर हार्ट ऐंड डायबिटीज इंस्टिट्यूट के जेम्स मैकफेडन और कार्लहींज पीटर ने एक रिपोर्ट में बताया है कि वैक्सीन में खून के थक्के जमने की समस्या सामने आने के बाद इसे स्टडी किया गया है और इसका इलाज भी किया जा सकता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि वैक्सीन के कारण thrombotic thrombocytopenia (VITT) या thrombosis with thrombocytopenia syndrome (TTS) कैसे होता है, इसे लेकर पूरी जानकारी अभी नहीं है लेकिन एक संभावित तरीका बताया गया है।
इसके मुताबिक वैक्सीन प्लेटलेट्स को ऐक्टिवेट कर देती है। आमतौर पर प्लेटलेट्स हमारे शरीर से खून निकलने पर थक्के जमाते हैं जिससे खून निकलना बंद हो जाता है। कुछ लोगों में ये ऐक्टिवेटेड प्लेटलेट्स एक प्रोटीन रिलीज करते हैं- प्लेटलेट फैक्टर 4(P4) जो वैक्सीन से जुड़ जाता है। इसकी वजह से इम्यून सिस्टम और ज्यादा प्लेटलेट्स बनाता है जो साथ में जुड़ने लगते हैं। इससे इनकी संख्या भी गिरने लगती है। इससे खून के थक्के भी जमते हैं और प्लेटलेट कम भी होते जाते है। दोनों चीजें साथ में होने से TTS पैदा होता है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि इसके जल्द से जल्द टेस्ट करके इलाज शुरू किया जा सकता है। इसके लिए खास ब्लड थिनर और दवाइयां दी जाती हैं जो इम्यून सिस्टम को कंट्रोल करती हैं। EMA की रिपोर्ट में भी लोगों को सलाह दी गई थी कि अगर उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो, सीने में दर्द हो, पैर में सूजन हो, पेट में लगातार दर्द हो, सिर में दर्द हो या देखने में दिक्कत हो और इंजेक्शन की जगह पर छोटे-छोटे ब्लड स्पॉट दिखें, तो उन्हें तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। पहले इसके कारण जान गंवाने वालों का प्रतिशत काफी ज्यादा था लेकिन समझ बढ़ने के साथ ही खतरा भी कम हो गया है। आमतौर पर लोगों को हल्के साइड इफेक्ट होते हैं जो कुछ दिन में ठीक हो जाते हैं।
वैक्सीन को लेकर आशंका की स्थिति हो सकती है लेकिन एक्सपर्ट्स और कई देशों के रेग्युलेटर्स का मानना है वायरस का खतरा ज्यादा बड़ा है। कोविड-19 के कारण खून के थक्के जमने की संभावना, वैक्सीन से ज्यादा है। EMA ने इसे वैक्सीन का बेहद दुर्लभ साइड इफेक्ट बताया है और ब्रिटेन का कहना है वैक्सीन और क्लॉट्स के बीच लिंक को स्टडी करने लिए और ज्यादा रिसर्च की जरूरत है। वहीं WHO ने का कहना है कि यह अभी पुख्ता नहीं है।
Pfizer की वैक्सीन कम असरदार? : वहीं, प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित हालिया रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, Pfizer की वैक्सीन भारत में मिले कोरोना वायरस के डेल्टा वेरिएंट B.1.617.2 के खिलाफ कम असरदार पाई गई है। भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर के इतने खतरनाक होने के पीछे डेल्टा वेरिएंट को ही जिम्मेदार माना जाता है।