
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन के लिए जर्मनी अधिकृत फ्रांस में जासूसी करने के लिए अपनी जान दांव पर लगाने वाली नूर इनायत खान पहली भारतीय ही नहीं, पहली दक्षिण एशियाई महिला बनीं हैं जिनके सम्मान में ब्लू प्लाक (Blue Plaque) का ऐलान का ऐलान किया गया है। ब्लूम्सबेरी के 4 टैविटन स्ट्रीट में जहां वह 1942-43 में रही थीं, उस घर को ऐतिहासिक महत्व का दर्जा देकर यह प्लाक लगाया गया है। सीक्रेट एजेंट नूर खान पहली महिला रेडियो ऑपरेटर थीं जिन्हें विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस भेजा गया था। उनकी जांबाजी की कहानी यह साबित करती है कि क्यों उन्हें इतने दशक बाद भी वीर का दर्जा दिया जाता है।
रूस, ब्रिटेन फिर फ्रांस में चली कहानी : खान का 1 जनवरी, 1914 को जन्म मॉस्को में हुआ था। उनके पिता भारतीय और मां अमेरिकी थीं। वह भारत के राजघराने में पैदा हुई थीं। टीपू सुल्तान के वंशज उनके पिता सूफी उपदेशक थे। खान परिवार पहले रूस, फिर ब्रिटेन और फ्रांस आ गए। नूर एक टैलेंटेड युवा थीं और उन्हें हार्प और पियानो बजाना आता था। वह काफी अच्छी फ्रेंच भी बोल लेती थीं। जिस वक्त दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ, नूर सिर्फ 25 साल की थीं। (फोटो: Royal Air Force)
नाजी फ्रांस में जाने वाली पहली महिला : साल 1940 में फ्रांस के पतन के बाद वह ब्रिटेन आ गईं और यहां Norah Baker के नाम से विमिन्स ऑग्जिलरी एयरफोर्सजॉइन कर लिया। यहां उन्होंने वायरलेस ऑपरेटर के तौर पर ट्रेनिंग ली। उनकी भाषा और टेक्निकल स्किल का फायदा तब हुआ जब उन्हें 1943 में SOE (स्पेशल ऑपरेशन्स एग्जिक्युटिव) के फ्रांस सेक्शन में लगाया गया। नूर पहली महिला रेडियो ऑपरेटर थीं जिन्हें नाजी अधिकृत फ्रांस में भेजा गया था। (फोटो: English Heritage)
‘मैडलीन’ नूर नहीं हटीं पीछे : जीन मैरी रेनियर के नाम से वह बच्चों की नर्स के तौर पर तैनात की गईं और उनका कोडनेम था ‘मैडलीन’। वह पकड़े गए वायुसेना कर्मियों को ब्रिटेन भागने में मदद करती थीं। लंदन तक जानकारियां पहुंचाती थीं और मेसेज रिसीव भी करती थीं। फ्रांस में ब्रिटेन के लिए जासूसी करने में उन्हें कई खतरों का सामना करना पड़ा लेकिन नूर वापस नहीं आईं। यहां तक कि उनके नेटवर्क के सभी एजेंट गिरफ्तार हो गए लेकिन नूर पीछे नहीं हटीं। पैरिस के एजेंट्स और लंदन के बीच वह अकेली कड़ी थीं। ऐसे में जंग के हालात में वह बेहद अहम थीं। (फोटो: Royal Air Force)
‘बेहद खतरनाक’ नूर : 13 अक्टूबर, 1943 को फ्रांस की महिला के धोखा देने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें कई यातनाएं भी दी गईं लेकिन उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी। उन्होंने भागने की कोशिश की लेकिन पकड़े जाने पर उन्हें ‘बेहद खतरनाक’ बताकर अकेले काल-कोठरी में डाल दिया गया। (फोटो: Royal Air Force)
सामने थी मौत, बोलीं- ‘आजादी’ : साल 1944 में उन्हें दखाऊ कंसन्ट्रेशन कैंप में भेज दिया गया। 13 सितंबर की सुबह उन्हें सिर के पीछे गोली मार दी गई। आखिरी वक्त में भी जब जर्मन सैनिकों ने अपने हथियार उठाए तो नूर का आखिरी शब्द था ‘liberte’ यानी आजादी। ब्रिटेन में वह 1946 तक लापता घोषित रहीं लेकिन 1946 में पूर्व गेस्टपो ऑफिसर क्रिस्चियन ऑट से पूछताछ के बाद उनकी कहानी दुनिया के सामने आई। Christian Ott.एक साल तक अदम्य नैतिक और शारीरिक साहस का परिचय देने के लिए उन्हें मरणोपरांत जॉर्ज क्रॉस से नवाजा गया।
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