
चीन की एक वैक्सीन के इंसानों पर ट्रायल के दूसरे चरण के नतीजे भी सफल रहे हैं। इनमें चीन की Ad5-nCOV वैक्सीन सुरक्षित और असरदार पाई गई है। इसे दिए जाने पर वॉलंटिअर्स में इम्यून रिस्पॉन्स देखा गया। ये नतीजे सोमवार को मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित हुए हैं। Lancet में ऑक्सफर्ड की वैक्सीन के पहले चरण के नतीजे भी छपे हैं। वह भी इंसानों पर असरदार और सुरक्षित पाई गई है।
चीन की वैक्सीन अडेनोवायरस टाइप 5 (adenovirus type-5, Ad5) वायरल वेक्टर से बनी है। ये वैक्सीन CanSino Biologics और मिलिट्री की एक यूनिट मिलकर बना रहे हैं। इस वैक्सीन का ट्रायल चीन के वुहान में किया गया था। वुहान में ही पिछले साल कोरोना वायरस SARS-CoV-2 के इन्फेक्शन के मामले दुनिया में सबसे पहले सामने आए थे। इस वैक्सीन को 18 साल से ज्यादा उम्र के स्वस्थ्य लोगों को दिया गया।
ऐंटीबॉडी पाई गईं
603 वॉलंटिअर्स पर इस वैक्सीन को टेस्ट किया गया और 28वें दिन वायरस को पहचानने वाली ऐंटीबॉडी पाई गईं। हालांकि, वैक्सीन को अभी किसी कोरोना वायरस पीड़ित पर टेस्ट नहीं किया गया है। ऐसे में Lancet का कहना है कि अभी तीसरे चरण के ट्रायल के नतीजे आने के बाद ही यह कहा जा सकेगा कि यह वैक्सीन SARS-CoV-2 इन्फेक्शन से बचाव कर पाती है या नहीं।
कैसे बनी है वैक्सीन?
Lancet में छपे रिसर्च पेपर में बताया गया है कि यह वैक्सीन वायरल वेक्टर से बनी है जिसमें COVID-19 बीमारी पैदा करने वाले कोरोना वायरस SARS-CoV-19 का स्पाइक प्रोटीन होता है। स्पाइक प्रोटीन की मदद से ऐंटीबॉडी वायरस को पहचान पाती हैं। वैक्सीन में इस्तेमाल किया गया वायरल वेक्टर उस वायरस को जेनेटिकली इंजिनियर करके बनाया गया है, जिससे चिंपानिजयों में सर्दी-जुखाम होता है। इसे इस तरह से इंजिनियर किया गया है कि यह दिखता कोरोना वायरस जैसा है जिसकी वजह से इंसानों में इससे लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता पैदा होती है लेकिन इन्फेक्शन नहीं होता।
शरीर पर क्या असर और कितनी सुरक्षित?
18-55 साल की उम्र के लोगों पर वैक्सीन का ट्रायल करने पर पता लगा कि इसने शरीर में प्रतिरोधक क्षमता पैदा की थी। इसमें स्पाइक प्रोटीन को पहचानने वाले T-cell और वायरस को बेअसर करने वाली ऐंटीबॉडी (IgG) भी देखी गई जो दूसरी डोज दिए जाने पर बढ़ गई। 90% लोगों में वायरस पर ऐक्शन करने वाली ऐंटीबॉडी पहली डोज के बाद और सभी लोगों में दूसरी डोज देने पर ऐंटीबॉडी की ऐक्टिविटी देखी गई। साथ ही यह भी देखा गया कि जिन लोगों को वैक्सीन दी गई थी उनमें सिरदर्द, बुखार, बदन दर्द जैसी शिकायतें हुईं लेकिन वह पैरासिटमॉल देने के बाद ठीक हो गईं। इसके ज्यादा गंभीर साइड इफेक्ट्स नहीं पाए गए जिनसे लोगों को बड़ा खतरा हुआ हो।
क्या करते हैं ऐंटीबॉडी और T-cell?
ऑक्सफर्ड की वैक्सीन को इस रेस में सबसे आगे माना जा रहा है। न सिर्फ उसके पास AstraZeneca जैसी कंपनी का साथ है बल्कि खुद वैक्सीन भी दूसरे कैंडिडेट्स से अलग है। दरअसल, इसके ट्रायल के नतीजों में पाया गया है कि वैक्सीन से ऐंटीबॉडी और वाइट ब्लड सेल- Killer-T-cells बनते हैं। इसमें ऐंटीबॉडी (IgG) पाई गई है जो वायरस के स्पाइक प्रोटीन को पहचानकर उससे अटैच हो जाती है और वायरस स्वस्थ्य कोशिकाओं को इन्फेक्ट नहीं कर पाता। वहीं, Killer T-cells ऐसे वाइट ब्लड सेल्स या Leukocytes होते हैं जो वायरस के इन्फेक्शन के शिकार हुई कोशिकाओं को पहचानकर उन्हें नष्ट कर देते हैं। ये दोनों साथ मिलकर शरीर को सुरक्षा देते हैं। ऐंटीबॉडी कुछ महीनों में खत्म भी हो सकती हैं लेकिन T-cells सालों तक शरीर में रहते हैं।
क्या अब आम लोगों को मिलने लगेगी?
वैक्सीन के इंसानों पर इस पहले ट्रायल में सिर्फ 1077 लोग शामिल हुए थे। अभी तक के नतीजे सकारात्मक जरूर हैं लेकिन इनके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अभी इसे आम जनता को दिया जा सकता है। इसके लिए अगले दो चरणों में ब्रिटेन में 10 हजार, अमेरिका में 30 हजार, दक्षिण अफ्रीका में 2 हजार और ब्राजील में 5 हजार लोगों पर टेस्ट किया जाएगा। तीसरे चरण के नतीजे आने के बाद ही यह तय होगा कि इसे लोगों को दिया जा सकता है या नहीं।
कब तक आएगी वैक्सीन?
पहले ट्रायल में सफल होने के बाद इसे इमर्जेंसी में इस्तेमाल करने की इजाजत मिल सकती है। ऐसे में हो सकता है कि अक्टूबर तक इसे उन लोगों को दिया जा सके जिन्हें ज्यादा खतरा है, जैसे हेल्थकेयर वर्कर्स। Astrazeneca का मानना है कि अगले साल की शुरुआत में पूरी तरह से अप्रूवल मिल सकता है। उसके बाद ही यह साफ होगा कि आम जनता तक यह कब पहुंचेगी और वैक्सिनेशन शुरू होगा। आमतौर पर वैक्सीन्स को बनने में 10-15 साल लग जाते हैं। ऐसे में अगर यह 2021 की शुरुआत तक इसे अप्रूवल मिल जाता है, तो यह भी अपने आप में बड़ी सफलता होगी।
ऑक्सफर्ड की वैक्सीन भी असरदार
उधर, Lancet में ही छपे दूसरे रिसर्च पेपर में बताया गया है कि वायरल वेक्टर से बनी ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी और AstraZeneca की कोरोना वायरस वैक्सीन ChAdOx1 nCoV-19 दिए जाने पर वायरस के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पाई गई। साथ ही इसे सुरक्षित भी बताया गया है। इसके साथ ही अब इसे अगले चरण के ट्रायल के लिए भी ओके कर दिया गया है। बता दें ऑक्सफर्ड की वैक्सीन को दूसरी वैक्सीन से पहले ही आगे माना जा रहा था क्योंकि यह वायरस से ‘दोहरी सुरक्षा’ देती है।
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