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भोजशाला के सच पर अदालत ने लगाई मुहर, इन सबूतों को नहीं काट पाया कोई, पस्त हुए विरोधी


शुभम केवलिया, धार: लंबे विवाद, पुरातत्व सर्वेक्षण और कानूनी सुनवाई के बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि धार की भोजशाला राजा भोज द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला और मंदिर है। अदालत ने वहां हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया। लेकिन, कोर्ट के इस फैसले पर कांग्रेस नेताओं और वामपंथी इतिहासकारों ने सवाल खड़े किए हैं।
दिग्विजय सिंह का गलत निकला दावा – मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि यह ASI का संरक्षित स्मारक है, इसीलिए यहां पूजा नहीं की जा सकती। हालांकि 1958 के प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम यानी AMASR Act में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। कानून में स्मारक को नुकसान नहीं पहुंचने की बात कही गई है। देश के कई संरक्षित स्मारकों में आज भी पूजा अर्चना की जाती है। विश्व धरोहर में शामिल बृहदेश्वर मंदिर भी इसका उदाहरण है।
बॉम्बे गजेटियर में मिलता है उल्लेख – भोजशाला विवाद से जुड़े सभी दस्तावेज में 1896 में प्रकाशित बंबई गजेटियर का खास महत्व है। इसमें यह उल्लेख किया गया है कि धार में मौजूद मस्जिद उसी स्थान पर बनी है, जहां कभी परमार शासक राजा भोज ने संस्कृत पाठशाला बनवाई थी। गजेटियर में यह भी लिखा है कि राजा भोज के बाद उनके वंशज नरवर्मन समेत अन्य शासकों ने इस विद्यालय की देखभाल की। दस्तावेज में एक कुएं का भी जिक्र है, जिसे तब सरस्वती कुआं या अक्ल कुआं कहा जाता था। किंवदंती है कि इसका पानी पीने से बुद्धि बढ़ती है। इस मान्यता से स्पष्ट होता है कि भले ही वहां मस्जिद निर्मित कर दी गई, मगर 1896 तक वहां संस्कृत विद्यालय ही था।
अभिलेख में दर्ज है इतिहास – भोजशाला विवाद में पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट महत्वपूर्ण है। विभाग द्वारा प्रकाशित कॉर्पस इंस्क्रिप्शन इंडीकेरम-7 (परमार अभिलेख) में उल्लेख है कि मौजूदा मस्जिद राजा भोज द्वारा बनवाए गए संस्कृत विद्यालय का परिवर्तित स्वरूप है। इस विवाद में केके लेले जैसे पुराविद की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने 1903 के अपने सर्वेक्षण के आधार पर इस स्थान को विद्यालय या मंदिर बताया था।
पुरानी रिपोर्ट में मंदिर का जिक्र – कुछ इतिहासकारों का आरोप है कि ASI विभाग सरकार के प्रभाव में काम करता है। मगर 1984-85 में प्रकाशित विभागीय रिपोर्ट में भोजशाला को मूल रूप से देवी सरस्वती का हिंदू मंदिर बताया गया था, जिसका निर्माण 11वीं शताब्दी में राजा भोज ने करवाया था। रिपोर्ट में इसका भी उल्लेख है कि मौजूदा मस्जिद के उत्तर और पश्चिम भाग में मंदिर के अवशेष आज भी मौजूद हैं। खास बात यह है कि उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। यदि विभाग केवल सरकार के निर्देशों पर काम करता, तो उस दौर में भोजशाला को मंदिर नहीं बताया जाता।
अंग्रेजों के समय से लेकर आज तक उपलब्ध कई दस्तावेजों और रिपोर्ट में यही उल्लेख मिलता है कि वहां राजा भोज की संस्कृत पाठशाला और सरस्वती मंदिर था, जिसका बाद में स्वरूप बदला गया। अदालत का फैसला भी इन्हीं पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर दिया गया है।