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चौकीदार से वैज्ञानिक और अब अमेरिका में सांसद, जानें कौन हैं एतिहासिक जीत हासिल करने वाले कर्नाटक के श्री थानेदार

अमेरिका में मध्‍यावधि चुनावों का शोर है और हर कोई पूर्व राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप की ही बातें कर रहा है। इन चुनावों में रिपब्लिकन्‍स, डेमोक्रेट्स पर भारी पड़े हैं। लेकिन एक डेमोक्रेट ऐसा है जिसने रिपब्लिकन के किले में फतह हासिल की है। अपनी जीत के साथ ही इन्‍होंने भारत का रुतबा भी बढ़ा दिया है। इनका नाम है श्री थानेदार और यह पहले भारतीय-अमेरिकी नेता बनें हैं जिन्‍होंने अमेरिका के मिशिगन में चुनाव जीता है। थानेदार अब अमेरिकी प्रतिनिधिसभा में पहुंचे हैं और उन्‍होंने रिपब्लिकन पार्टी के मार्टेल बिविंग्स को शिकस्‍त दी है। थानेदार की कहानी अपने आप में प्रेरणा देने वाली है। पिछले कुछ दिनों से भारत में ब्रिटेन के नये प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की ही चर्चाएं हैं। श्री थानेदार की कहानी भी उतनी ही प्रेरणादायी है और इसे जानने के बाद सुनक की ही तरह उनका जिक्र भी आने वाले समय में होगा।
मुश्किलों भरा जीवन – श्री थानेदार अब अमेरिकी सांसद बने हैं लेकिन वह एक उद्यमी हैं। मिशिगन में यह पहला मौका है जब किसी भारतीय को यहां पर जीत मिली है। यू-ट्यूब पर उनके भाषण सुनकर आप उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे। एक अरबपति 67 साल के श्री थानेदार, राजा कृष्णमूर्ति, रो खन्ना और प्रमिला जयपाल की कतार में शामिल हो गए हैं।
कर्नाटक के बेलगाम में सन् 1955 में एक कम आय वाले परिवार में श्री थानेदार का जन्‍म हुआ था। जीवन मुश्किलों में गुरजर रहा था और अचानक 55 साल की उम्र में पिता रिटायर हो गये। पिता के रिटायरमेंट के बाद परिवार को मदद करने के लिये 14 साल की उम्र में ही उन्‍हें कई तरह के काम करने पड़े। पिता की मौत के बाद उन्‍होंने चौकीदार की भी जॉब की।
फिर भी नहीं टूटा हौसला – मुश्किलों के बाद भी थानेदार ने 18 साल की उम्र में मुंबई यूनिवर्सिटी से केमेस्‍ट्री में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद इसी यूनिवर्सिटी से उन्‍होंने मास्‍टर्स की डिग्री भी ली। इसके बाद उन्‍हें भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) में वैज्ञानिक की जॉब मिली। फिर साल 1979 में अमेरिका की एक्रॉन यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने के लिये वह विदेश चले गए। साल 1982 में उन्‍हें पीएचडी की डिग्री मिली और साल 1988 में उन्‍होंने अमेरिका की नागरिकता ले ली। थानेदार ने पीएचडी की डिग्री के बाद मिशिगन यूनिवर्सिटी में भी नौकरी की। साल 1984 में उन्‍हें पेट्रोलाइट कॉर्प में एक रिसर्चर की जॉब मिल गई थी।
जहां करते थे काम, वही कंपनी खरीदी – श्री थानेदार ने सन् 1990 में केमिर पॉलीटेक लैबोरेट्रीज में 15 डॉलर प्रति घंटे पर नौकरी करनी शुरू की। साल 1991 में उन्‍होंने बैंक से 75,000 डॉलर का कर्ज लिया और इसी कंपनी को खरीद लिया। पहले साल में उन्‍होंने 150,000 डॉलर का बिजनेस किया और सिर्फ तीन ही कर्मी थे। साल 2005 तक इसका रेवेन्‍यू 16 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया और यहां पर काम करने वाले लोगों की संख्‍या 160 हो गई जिसमें 40 पीएचडी डिग्री वाले थे। साल 2008 तक थानेदार की कंपनी में 500 लोग काम करते थे और रेवेन्‍यू 55 मिलियन डॉलर था।
भारत आने का सपना – थानेदार का कहना है कि वह काफी उम्‍मीदों के साथ अमेरिका आये थे। उनकी हर उम्‍मीद और हर सपना अमेरिका में पूरा हुआ था। अब वह इस देश को कुछ लौटाना चाहते हैं। वह कहते हैं कि उन्‍होंने तो अपना अमेरिकन ड्रीम पूरा कर लिया है लेकिन फिर भी अभी कई लोग ऐसे हैं जिनका यह सपना अधूरा है। वह अश्‍वेत समुदाय के लिये कुछ करना चाहते थे। इसलिये उन्‍होंने चुनाव में उतरने का फैसला किया। उनका मानना है कि वह काफी सौभाग्‍यशाली रहे हैं और अब वह लोगों की सेवा करना चाहते हैं। उन्‍होंने मराठी में अपनी आत्‍मकथा लिखी है और इसमें उन्‍होंने बताया है कि वह भारत को बहुत मिस करते हैं। कोविड-19 की वजह से वह पिछले दो सालों से देश नहीं आ पाए हैं।