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‘यूरेनियम हमें सौपें, परमाणु कार्यक्रम सीमित करें’, वार्ता के लिए अमेरिका ने ईरान के सामने रखीं 5 शर्तें


अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान से बातचीत आगे बढ़ाने और समझौते के लिए पांच शर्तें रखी हैं। इन शर्तों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना और यूरेनियम को ईरान से बाहर भेजना शामिल है। अमेरिका ने ईरान की ओर से की जा रही मांगों को खारिज करते हुए ये शर्त रखी है। अमेरिका और ईरान के बीच 39 दिन की लड़ाई के बाद 8 अप्रैल को सीजफायर हुआ था। इसके बाद दोनों पक्षों में बातचीत से समझौते की कोशिश नाकाम रही है।
ईरान की फार्स न्यूज एजेंसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने अपनी शर्तों में ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों और नीतिगत फैसलों से हुए नुकसान के लिए ईरान को मुआवजा देने से इनकार कर दिया है। यह ईरान की किसी भी समझौते के लिए एक अहम मांग रही है। ईरान ने बार-बार इस मांग को उठाया है।
अमेरिकी ने मांगा ईरान का यूरेनियम – अमेरिका ने कथित तौर पर मांग की है कि ईरान बातचीत के लिए 400 किलोग्राम एनरिच्ड यूरेनियम वॉशिंगटन को सौंप दे। रिपोर्ट में बताई गई एक और शर्त यह है कि ईरान की परमाणु सुविधाओं का केवल एक ही सेट चालू रहना चाहिए। ईरान को अपनी बाकी न्यूक्लियर फैसिलिटीज को बंद करना होगा।
अमेरिका ने ईरान की विदेश में जमा संपत्ति का 25 प्रतिशत हिस्सा भी जारी करने से इनकार कर दिया है। ईरानी मीडिया ने रविवार को कहा कि अमेरिका युद्ध खत्म करने के लिए बातचीत के ईरान के प्रस्ताव के जवाब में कोई ठोस रियायत देने में नाकाम रहा है। इससे चीजों को बातचीत से हल करने में दिक्कत आएगी।
ईरान का अमेरिका पर सख्त रुख – ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका की कोशिश ईरान से ऐसी रियायतें हासिल करना है, जिन्हें वह युद्ध सेन हासिल करने में नाकाम रहा है। दूसरी ओर वह ईरान को कोई रियात देने के लिए तैयार नहीं है। इस रवैये से साफतौर पर बातचीत में गतिरोध पैदा होगा और वार्ता मुश्किल हो जाएगी।
ईरान ने अमेरिका से बातचीत में युद्ध से हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी संप्रभुता को मान्यता देने को कहा है और परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे को फिलहाल किनारे करने को कहा है। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इन मुद्दों पर तैयार नहीं दिख रहे हैं।
28 फरवरी से है तनाव – 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका-इजरायल के संयुक्त सैन्य हमले करने के बाद से पूरे पश्चिम एशिया में तनाव है। भीषण लड़ाई के बाद 8 अप्रैल को पाकिस्तान की मध्यस्थता से युद्धविराम पर सहमति बन गई लेकिन इसके बाद इस्लामाबाद में हुई बातचीत से कोई अंतिम शांति समझौता नहीं हो पाया है।