
हमारे देश का नाम क्या होगा? क्या इसे भारत कहा जाए या इंडिया। एक बार फिर इसकी चर्चा शुरू हो गई है। राष्ट्रपति भवन की ओर से जी20 डिनर आमंत्रण को ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ की ओर से भेजा गया है। इससे पहले ऐसा लगभग कभी नहीं हुआ है। अंग्रेजी में हमेशा लिखते हुए इंडिया लिखा जाता रहा है। इस आमंत्रण पत्र के आने के बाद से राजनीतिक गलियारों पर चर्चा तेज हो गई है। लेकिन क्या आपको पता है कि इंडिया नाम भारत के पास न जाए, इसका विरोध जिन्ना ने किया था।
अगस्त 1947 में अंग्रेज भारत छोड़ कर चले गए थे। उसके लगभग एक महीने बाद ही लुईस माउंटबेटन ने मोहम्मद अली जिन्ना को एक कला प्रदर्शनी का मानद अध्यक्ष बनने के लिए आमंत्रित किया था। माउंटबेटन जहां भारत तो वहीं जिन्ना पाकिस्तान के गवर्नर जनरल थे। इस तरह का आमंत्रण एक औपचारिकता थी। लेकिन तब जिन्ना ने इसका विरोध किया। क्योंकि इस पर हिंदुस्तान की जगह इंडिया लिखा हुआ था। तब जिन्ना ने माउंटबेटन को लिखा, ‘यह अफसोस की बात है कि कुछ रहस्यमय कारणों से हिंदुस्तान ने ‘इंडिया’ शब्द अपना लिया है, जो निश्चित रूप से भ्रामक है और इसका उद्देश्य भ्रम पैदा करना है।’
जिन्ना की एक न चली – जिन्ना चाहते थे कि इस पर ‘पाकिस्तान और हिंदुस्तान कला की प्रदर्शनी’ लिखा हो, जो माउंटबेटन को पसंद नहीं था। आखिरकार जिन्ना को यह निंत्रण वैसे ही स्वीकार करना पड़ा। ऐसा सिर्फ एक ही बार नहीं हुआ। मुस्लिम लीग ने विभाजन से पहले यूनियन ऑफ इंडिया नाम पर आपत्ति जताई थी। हालांकि ऐसा क्यों किया गया इस पर कोई साफ बात सामने नहीं आई। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि जिन्ना ने पाकिस्तान (मुस्लिम) और हिंदुस्तान (हिंदू) का धर्म के आधार पर बंटवारे की राजनीति कभी नहीं छोड़ी।
संविधान में हैं दोनों नाम – ब्रिटिशों नें उपमहाद्वीप में अपने साम्राज्य के नाम के रूप में इंडिया का इस्तेमाल किया, जो मूल रूप से ग्रीक भाषा से जुड़ा था। लेकिन इंडिया के नाम को लेकर देश के अंदर भी विवाद होते रहे हैं। बाद में हमारे संविधान में भारत और इंडिया दोनों पर ही सहमति बनी। संविधान के पहले अनुच्छेद में लिखा है, ‘इंडिया अर्थात भारत, राज्यों का एक संघ होगा।’ वहीं अगर पाकिस्तान की बात करें तो कुछ दशक पहले जब यह देश अस्तित्व में आया तब एक नया नाम दुनिया ने सुना।
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