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आज से संसद में परिसीमन पर घमासान, ‘नंबर बनाम न्याय’ की जंग में दक्षिण और उत्तर आमने-सामने


सरकार ने आज से संसद का विशेष सत्र बुलाया है। पार्लियामेंट सेशन अब वैसे भी सरकार और विपक्ष के बीच जोर-आजमाइश का मौका बनते जा रहे हैं, लेकिन इस बार गतिरोध और भी बड़ा है। परिसीमन को लेकर दक्षिण के राज्यों की आपत्ति पुरानी है और इस मामले में विपक्ष भी एकजुट दिख रहा है।
दक्षिण की परेशानी: इस विशेष सत्र के लिए सांसदों को तीन ड्राफ्ट बिल भेजे गए हैं। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के जरिये लोकसभा में 850 सीटें करने का प्रस्ताव है, जबकि डीलिमिटेशन बिल 2026 से 2011 की जनगणना को आधार बनाया जा सकेगा। दक्षिण के राज्यों की चिंता है कि अगर जनसंख्या के आधार पर लोकसभा की सीटें बढ़ाई गईं, तो उत्तर भारत की तुलना में उनके यहां सीटें कम हो जाएंगी। इससे केंद्र स्तर पर फैसले लेने में दक्षिणी राज्यों की भूमिका कमजोर हो जाएगी।
विकास में योगदान: केंद्र सरकार ने इस तरह की आशंका को खारिज किया है, लेकिन इसका विरोध इसलिए इतना तीव्र है क्योंकि यह डर बहुत पुराना है। दक्षिण के राज्यों ने उत्तर की तुलना में शिक्षा, स्वास्थ्य और जागरूकता में ज्यादा निवेश किया है। इसका असर जनसंख्या से लेकर बाकी क्षेत्रों में भी दिखता है। केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में फर्टिलिटी रेट राष्ट्रीय औसत 1.9 से कहीं कम 1.6 है। 1971 में भारत की आबादी में दक्षिणी राज्यों का प्रतिशत करीब 24 था, जो अब 20 के आसपास है। वहीं, देश की आर्थिक प्रगति में उनकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। आज कम आबादी के बावजूद दक्षिण के राज्य करीब-करीब उत्तर के बराबर योगदान दे रहे हैं। उन्होंने प्रॉडक्टिविटी बढ़ाई और मजबूत उद्योग खड़े किए हैं।
रोक की मांग: उत्तर की तुलना में दक्षिण की तेज तरक्की की वजह दमदार योजनाएं और नीतियों का सही क्रियान्वयन है। ऐसे में अब उनका सवाल उठाना लाजमी है कि क्या उन्हें बेहतर प्रदर्शन की सजा मिल रही है? इसी सवाल की वजह से 1976 और 2001 में भी तत्कालीन सरकारों ने सीटें नहीं बढ़ाई थीं। पिछले साल मार्च में दक्षिण के राज्यों की जॉइंट एक्शन कमिटी की बैठक हुई थी, जिसमें प्रस्ताव पारित हुआ कि परिसीमन पर लगी रोक को 25 साल और बढ़ाकर 2050 तक कर दिया जाए।
चिंता का ख्याल: दक्षिण के राज्य आज जो सवाल उठा रहे हैं वह राजनीतिक से ज्यादा सामाजिक है। अगर किसी समाज ने जागरूकता दिखाई है, तो उसे ऐसा नहीं लगना चाहिए कि उसके साथ अन्याय हो रहा है। अभी यह पूरी तरह साफ नहीं है कि सीटें किस तरह से बढ़ाई जाएंगी। परिसीमन आयोग इसे अंतिम रूप देगा। इसमें दक्षिण की चिंताओं का ख्याल रखा जाना चाहिए।