
सोइशिरो होंडा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दिवालिया हो गए थे। पहले तो अमरीकी बमबारी ने उनकी फैक्टरी तबाह कर दी थी, फिर एक भूकम्प ने उनके ऑटो प्लांट को बिल्कुल नष्ट कर दिया। उन पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था, पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। बदहाली में भी कुछ सोचने की उनकी आदत बनी रही। अब उनके पास स्वयं की केवल एक साइकिल बची थी। होंडा के दिमाग में एक विचार आया। उन्होंने एक बेकार जी.आई. इंजन लिया और उसे अपनी साइकिल में लगा दिया। उनका विचार कामयाब रहा और वह साइकिल मोटरसाइकिल बन गई। एक बार वह अपने एक मित्र के घर गए, उनके मित्र ने साइकिल का मोटर बाइक में बदला प्रारूप देखा तो उसे बहुत पसंद आया। उसने तुरंत कहा, ‘‘दोस्त, मेरा आग्रह है कि तुम मुझे भी एक ऐसी ही मोटर बाइक बनाकर दो।’’
सोइशिरो ने तत्काल हामी भर दी। यहां से साइकिल का मोटर बाइक बनाने का ऐसा सिलसिला चल पड़ा जो आगे ही बढ़ता रहा। दोस्त के दोस्त, फिर उनके दोस्त सोइशिरो को आर्डरों की कभी कमी नहीं पड़ी। फिर भी 1948 में जब होंडा ने मोटर बाइक की अपनी पहली फैक्टरी खोली तो उसके पास स्पेयर पार्ट्स खरीदने तक के पैसे नहीं थे। पत्नी के गहने बेचकर उन्होंने स्पेयर पार्ट्स खरीदे।
पत्नी का त्याग व होंडा की मेहनत रंग लाई और होंडा कम्पनी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कम्पनियों में से एक बन गई। 8वीं कक्षा तक शिक्षा ग्रहण करने वाले होंडा को हेनरी फोर्ड के बाद दुनिया का महानतम इंजीनियर माना जाता है। अमरीकन ऑटोमोबाइल हाल ऑफ फेम में चुने जाने वाले वह पहले जापानी एग्जीक्यूटिव थे क्योंकि उन्होंने क्रैटेलिटिक इंजन की बहुत जटिल समस्या को सुलझाया था जो कि उच्च शिक्षित डेट्रॉइट इंजीनियरों से भी न सुलझ सकी थी। होंडा ने अपनी हिम्मत के बल पर ही दुनिया की बेहतरीन ऑटोमोबाइल कम्पनी स्थापित की।
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