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दिल्ली के अशोका होटल की मेहमाननवाजी बेहद खास; मुकेश अंबानी से लेकर विदेशी नेताओं की पहली पसंद


26 अक्टूबर 1956, उस दिन दिल्ली में उद्घाटन हो रहा था एक लाजवाब होटल का। नाम था अशोक होटल। हालांकि, उसकी पहचान बनी अशोका होटल नाम से। उद्घाटन पर मुंबई के पारसी वास्तुकार प्रोफेसर ई.बी. डॉक्टर भी मौजूद थे। उन्होंने ही इस शानदार इमारत का डिजाइन तैयार किया था।
अंबानी की पसंद। अशोक होटल की मेहमाननवाजी का दायरा भी बेहद खास रहा है। क्यूबा के क्रांतिकारी चे ग्वेरा 30 जून 1959 को दिल्ली आए और करीब एक सप्ताह तक इसी होटल में रुके थे। 1983 में हुए गुट निरपेक्ष सम्मेलन के दौरान क्यूबा के जननेता फिदेल कास्त्रो और फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) के यासर अराफत भी यहां रह चुके हैं। कहते हैं कि तब सुरक्षा कारणों के चलते कास्त्रो से मिलते-जुलते तीन और लोगों को होटल में रखा गया था। धीरूभाई अंबानी भी 1970 के दशक में यहां नियमित रूप से ठहरते थे। उन्हें नेहरू पार्क की हरियाली की ओर खुलने वाला कमरा पसंद था।
निर्माण की कहानी। कहते हैं कि 1955 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू यूनेस्को की एक बैठक में शामिल होने पेरिस गए थे। वहां उन्होंने प्रस्ताव रखा कि अगले साल की बैठक नई दिल्ली में आयोजित की जाए। प्रस्ताव मंजूर हो गया, लेकिन इसके बाद एक बड़ी समस्या सामने आई। उस समय दिल्ली में ऐसा कोई बड़ा और आधुनिक होटल नहीं था, जहां दुनिया भर से आने वाले मेहमानों को ठहराया जा सके। नेहरू इस समस्या का जल्दी समाधान चाहते थे। अधिकारियों को उपयुक्त जमीन तलाशने की जिम्मेदारी दी गई और आखिरकार चाणक्यपुरी में इस होटल को बनाने का फैसला हुआ।
प्रभाकरण भी रुके। लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) के प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण ने 28 जुलाई 1987 को भारत के तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी से राजधानी में मुलाकात की थी। उन्हें भी अशोक होटल में ठहराया गया था। राजीव गांधी से मिलने के लिए उन्हें हरदीप सिंह पुरी ने मनाया था। पुरी तब कोलंबो स्थित भारतीय उच्चायोग से जुड़े हुए थे। प्रभाकरण के साथ उनके करीबी साथी महेंद्र राजा और एंटेन बालासिंघम भी ठहरे थे।
यादों का हिस्सा। अशोक होटल की सबसे बड़ी खासियत उसकी भव्य वास्तुकला है। इसकी विशाल लॉबी में कदम रखते ही किसी महल जैसा एहसास होता है। छत से लटकते बड़े-बड़े झूमर और भगवान विष्णु की प्रतिमा इस जगह को खास बनाते हैं। यह प्रतिमा डॉ. कर्ण सिंह ने भेंट की थी। जब यह होटल बना, तब आसपास झाड़ियां थीं, कुछ झुग्गी बस्तियां और काफी जमीन खाली पड़ी थी।
समय के साथ यहां दूतावास और राजनयिक आवास बने। इस तरह होटल और चाणक्यपुरी, दोनों का विकास साथ-साथ हुआ। सात दशक बाद भी यह होटल दिल्ली के इतिहास, भारतीय कूटनीति और कई पीढ़ियों की यादों का हिस्सा है। यह उस दौर की कहानी सुनाता है, जब नया भारत दुनिया के सामने अपनी पहचान बना रहा था।