
सिगरेट नहीं पीने वाले लोगों के लिए भी तंबाकू का धुंआ चिंता का कारण हो सकता है। जब कोई व्यक्ति आसपास स्मोकिंग करता है और दूसरा व्यक्ति उस धुएं को सांस के साथ अंदर लेता है, तो इसे सेंकड हैंड स्मोक या पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है। इस धुएं में मौजूद हानिकारक कैमिकल्स फेफड़ों को प्रभावित कर सकते हैं, यही वजह है कि बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के पास स्मोकिंग करने से माना किया जाता है।
सेकंड हैंड स्मोकिंंग से खराब हो सकते है आपके फेफड़े- अगर आप खुद सिगरेट नहीं पीते, फिर भी आपके आसपास कोई व्यक्ति लगातार स्मोकिंग करता है, तो उसका धुआं आपके फेफड़ों तक पहुंच सकता है। इसे सेंकड हैंड स्मोकिंग या पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है। यह केवल धुएं की बदबू या कुछ देर की परेशानी नहीं है, बल्कि लंबे समय तक ऐसे माहौल में रहने से फेफड़ों और हार्ट हेल्थ पर गंभीर असर पड़ सकता है। रिसर्च में पाया गया है कि सिगरेट या धूम्रपान न करने पर भी सेंकड हेैंड स्मोकिंग से लंग कैंसर, कोरोनरी हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ सकती है।
खास चिंता की बात यह है कि इस तरह का माहौल घर, ऑफिस, वाहन या किसी बंद कमरे में बार-बार हो सकता है। इसलिए अगर कोई व्यक्ति खुद स्मोकिंग नहीं करता, लेकिन उसके आसपास लोग नियमित रूप से स्मोकिंग करते हैं, तो उसे भी इससे नुकसान हो सकता है।
सेकंड हैंड स्मोक क्या है और यह शरीर में कैसे पहुंचता है? – सीडीसी के अनुसार सेकंड हैंड स्मोक वह तंबाकू का धुंआ है जिसे कोई सिगरेट न पीना वाला व्यक्ति तब सांस के साथ अंदर लेता है जब उसके आसपास कोई व्यक्ति सिगरेट, सिगार, हुक्का या किसी अन्य तरह का धूम्रपान का इस्तेमाल कर रहा हो। इसमें धूम्रपान करने वाले व्यक्ति द्वारा बाहर छोड़ा गया धुआं और जलती हुई सिगरेट के सिरे से निकलने वाला स्मोक दोनों शामिल होते हैं।
जब धूम्रपान किसी बंद कमरे, घर, कार या अन्य इंडोर स्पेस में होती है, तो स्मोक हवा में फैल जाता है। वहां मौजूद व्यक्ति बिना स्मोकिंग किए भी उसी हवा को सांस के साथ अंदर लेता है। WHO के अनुसार तंबाकू का धुआं के संपर्क से बचने का सबसे प्रभावी तरीका पूरी तरह स्मोक फ्री इंवायरमेंट बनाना है; केवल वेंटिलेशन या खिड़की खोल देना पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता।
यानी अगर घर में कोई व्यक्ति रोज धूम्रपान करता है और बाकी लोग उसी कमरे में मौजूद रहते हैं, तो वे भी नियमित रूप से तंबाकू का धुएं के संपर्क में आ सकते हैं।
खुद स्मोकिंग न करने पर भी फेफड़ों को नुकसान कैसे हो सकता है?
सेकंड हैंड स्मोकिंंग से खराब हो सकते है आपके फेफड़े <br>
can secondhand smoke damage your lungs (Designed By Istock)
डब्लूएचओ के अनुसार फेफड़ों का काम हवा से ऑक्सीजन को शरीर तक पहुंचाना है। लेकिन जब सांस के साथ तंबाकू का धुआं अंदर जाता है, तो उसके साथ कई टॉक्सिक और हानिकारक पदार्थ भी शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। ये वायु मार्ग में इंफ्लेमेशन पैदा कर सकते हैं और लंबे समय तक इस धुएं के संपर्क में रहने से फेफड़ों के कार्य पर असर पड़ सकता है।
सीडीसी के अनुसार सेकंड हैंड स्मोक के संपर्क में रहने से धूम्रपान न करने वालों में भी रेस्पिरेटरी और इंफ्लामेटरी प्रभाव देखने कोे मिल सकते हैं। बच्चों में इसके कारण व्हीजिंग, कफ, सांस लेने में परेशानी, रेस्पिरेटरी इंफेक्शन और फेफड़ों की ग्रोथ धीमी होने का जोखिम होता है।
पैसिव स्मोकिंग में कौन-से टॉक्सिक कैमिकल्स सांस के साथ अंदर जाते हैं?
तंबाकू का धुआं कोई एक कैमिकल नहीं है, बल्कि हजारों कैमिकल्स का एक कॉम्पलैक्स मिक्सचर है। WHO के अनुसार तंबाकू का धुएं में 7,000 से अधिक कैमिकल्स पाए जाते हैं और इनमें कई टॉक्सिक तखा कैंसर का कारण बनने वाले पदार्थ शामिल होते हैं।
सीडीसी के अनुसार इनमें निकोटिन, कॉर्बन मोनोऑक्साइड, टार, अर्सेनिक, साइनाइड जैसे हानिकारक पदार्थ शामिल हो सकते हैं। कुछ तंबाकू के धुएं में शरीर की सेल्स और टिशू को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
लंबे समय तक पैसिव स्मोकिंग से फेफड़ों की कौन-सी परेशानियां हो सकती हैं?
अस्थमा और अस्थमा का अटैक पड़ना
रेस्पिरेटरी इंफेक्शन
लंग फंक्शन पर असर
लंग कैंसर
सीओपीडी और दूसरी क्रोनिक लंग प्रोब्लम – सिगरेट न पीना निश्चित रूप से लंग हेल्थ के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है, लेकिन अगर व्यक्ति लगातार दूसरों के सिगरेट स्मोक के संपर्क में रहता है, तो उसका जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता। सेकंड हैंड स्मोक में मौजूद हानिकारक कैमिकल्स सांस के साथ फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं और लंबे समय में रेस्पिरेटरी प्रोबलम्स, अस्थमा, सीपीओडी और लंग कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं। खासकर बच्चों, नवजात शिशुओं, बुजुर्गों और पहले से लंग डिजीज वाले लोगों को पैसिव स्मोकिंग से बचाना जरूरी है। घर और कार को पूरी तरह स्मोक फ्री रखना सेकंड हैंड स्मोक से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
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