
भूमध्य सागर और लाल सागर को जोड़ने के लिए 19वीं सदी में बनाया गया आर्किटेक्चर का ऐसा नूमना जिसकी आज हर ओर चर्चा है। स्वेज नहर में एक जहाज करीब पांच दिन से फंसा है और उसे निकालने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगे आना पड़ा है। ऐसे में इस नहर का इतिहास और भी खास हो जाता है। 1854 में मिस्र में फ्रांस के पूर्व राजदूत फर्डीनैंड डि लेसीप ने मिस्र के ऑटोमन गवर्नर के साथ एक समझौता किया। इसके लिए इस्थमस ऑफ स्वेज पर 100 मील की नहर के निर्माण का प्रस्ताव था। इंजिनियर्स की अंतरराष्ट्रीय टीम ने निर्माण का प्लान तैयार किया और 1856 में स्वेज कनाल कंपनी तैयार की गई। इसे काम पूरा होने के 99 साल बाद तक नहर ऑपरेट करने का अधिकार दिया गया।
हाथ से किया गया था निर्माण : निर्माणकार्य अप्रैल 1859 में शुरू किया गया। जिस वक्त में यह निर्माण किया गया तब बहुत ज्यादा तकनीक और उपकरण मौजूद नहीं थे। मजदूरों ने इसे हाथ से बनाया था। बाद में यूरोप से मजदूर आए जिनके पास बेहतर उपकरण थे। इस दौरान मजदूरों को लेकर विवाद और कॉलरा की महामारी भी फैली। आखिरकार साल 1869 में इसका काम पूरा हुआ। जब यह शुरू हुआ तब यह नहर तल में 25 फीट गहरी और 72 फीट चौड़ी और सतह पर 200-300 फीट चौड़ी थी। साल 1876 से इसे और बेहतर करने का काम शुरू हुआ। इसके बाद इस रास्ते का खूब जोरों-शोरों से इस्तेमाल होने लगा।
यूं बदले मालिक : साल 1875 में ग्रेट ब्रिटेन स्वेज कनाल कंपनी का सबसे बड़ा शेयरहोल्डर बन गया जब उसने नए ऑटोमन गवर्नर से स्टॉक खरीद लिए। सात साल बाद 1882 में ब्रिटेन ने मिस्र पर कब्जा कर लिया। साल 1936 में मिस्र को आजादी मिली लेकिन ब्रिटेन के पास कनाल का अधिकार रहा। दूसरे विश्व युद्ध के बाद मिस्र ने कनाल जोन में ब्रिटिश सैनिकों से आजादी की मांग की और जुलाई 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्देल नसर ने कनाल का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उन्हें उम्मीद थी कि टोल की मदद से नील नदी पर बने विशाल बांद के निर्माण का खर्चा निकाला जा सकेगा।
और लौट आई शांति : इसके जवाब में इजरायल ने चढ़ाई कर दी और ब्रिटिश और फ्रेंच सैनिकों ने कनाल जोन पर कब्जा कर लिया। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के दबाव में सभी को लौटना पड़ा। मिस्र ने फिर से नहर का कंट्रोल ले लिया और कमर्शल शिपिंग के लिए इसे खोल दिया। 10 साल बाद मिस्र ने इसे बंद कर दिया और अगले आठ साल तक यह मिस्र और इजरायल की सेनाओं के बीच फ्रंटलाइन के तौर पर मौजूद रहा। 1975 में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर अल-सादत ने शांति संकेत के तौर पर इसे खोल दिया और आज दर्जनों जहाज यहां से हर दिन निकलते हैं।
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