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ईरान का चाबहार बनाम पाकिस्‍तानी ग्‍वादर पोर्ट, भारत और चीन के बीच प्रतिस्‍पर्द्धा का अखाड़ा बना हिंद महासागर, जानें


हिन्द महासागर में काफी समय से ये महसूस किया जा रहा है कि भारत और चीन इस इलाके में अपना दबदबा बनाना चाहते हैं। इंडियन ओशन रीजन या हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी नौसेना की बढ़ती उपस्थिति और गतिविधियां भी भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का सबब बनी हैं।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद समेत कई मुद्दों पर रस्साकशी दुनिया से छुपी नहीं है। बीते दो दशकों में चीन दुनिया की दूसरी तो भारत पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना गया है। ऐसे में चीन और भारत व्यापार और सुरक्षा के मामले में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए हिंद महासागर क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय गलियारों पर भी अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में तीन महाद्वीपों में फैले 28 देश शामिल हैं, इसमें कई देश दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं हैं। इस क्षेत्र में दुनिया के कुछ सबसे कीमती प्राकृतिक संसाधन भी मौजूद हैं। यहां दुनिया के तेल भंडार का 16.8 फीसदी और वैश्विक प्राकृतिक गैस भंडार का 27.9 प्रतिशत है। ऐसे में दोनों देश किसी भी तरह अपना-अपना प्रभुत्व इस क्षेत्र पर चाहते हैं।
मॉडर्न डिप्लोमेसी ने हिंद महासागर में चीन और भारत के प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों पर रिपोर्ट की है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने हिंद महासागर में अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए ‘स्ट्रिंग्स ऑफ पर्ल्स’ समुद्री रणनीति अपनाई है। इस रणनीति का पहला आयाम थाई नहर के माध्यम से समुद्री रेशम मार्ग का विस्तार करना और उसके बाद सिंगापुर के मलक्का जलडमरूमध्य को पार करना है। यह देखते हुए कि अमेरिका और भारत के पास जलडमरूमध्य में रणनीतिक पकड़ है, चीन को थाई नहर के जरिए अपने दक्षिण चीन सागर बेस और हिंद महासागर के बीच जहाजों को तैनात करने का रास्ता मिला है। यह नया मार्ग पारगमन समय को काफी कम कर देगा, क्योंकि चीनी जहाजों को आमतौर पर मलेशिया से गुजरने के लिए दक्षिण में 700 मील की अतिरिक्त यात्रा करनी पड़ती है।
चीन कई एशियाई देशों में कर रहा है निवेश – चीन ने स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति के दूसरे पहलू के तहत बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव और तंजानिया जैसे तटीय दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी देशों में बंदरगाहों के निर्माण किए हैं। चीन की बंदरगाहों में निवेश की रणनीति के सबसे उल्लेखनीय परिणामों में से एक बाब अल-मंदब में निवेश है। जनवरी 2016 में चीन ने इस बंदरगाह के पास चीनी नौसेना के लिए एक सहायता स्टेशन बनाने के लिए जिबूती के साथ 10 साल के समझौते पर हस्ताक्षर किए। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की गतिविधियों के जवाब में भारत ने हिंद महासागर के देशों के साथ नौसैनिक सहयोग, विकास सहायता और निवेश को बढ़ावा देने के लिए अपनी ‘नेकलेस ऑफ डायमंड’ रणनीति अपनाई है।
भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘एक्ट ईस्ट’ प्लान के तहत ही नेकलेस ऑफ डायमंड रणनीति आती है। इसका उद्देश्य आसियान के साथ संबंधों को मजबूत करना और चीन के समुद्री प्रभुत्व के बारे में चिंताओं को दूर करना है। भारत ने डुकम पोर्ट, ओमान में सुविधाएं स्थापित की हैं। इनमें मोजाम्बिक चैनल, मलक्का जलडमरूमध्य, सुंडा जलडमरूमध्य, लोम्बोक जलडमरूमध्य और चांगी नौसैनिक अड्डा शामिल है। इससे 2018 में इंडोनेशिया के सबांग बंदरगाह तक सैन्य पहुंच भी हासिल हुई है। इसके अलावा भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ किए गए क्वाड गठबंधन पर जोर दिया है, क्योंकि ये देश रणनीतिक खुफिया और सैन्य अभ्यास में सहयोग करने के लिए इस मंच का इस्तेमाल करते हैं।
पाकिस्तान में चीन को मिला है बंदरगाह – हिंद महासागर में चीन और भारत प्रतिस्पर्धा का शायद सबसे प्रमुख क्षेत्र पाकिस्तान में बीजिंग द्वारा संचालित ग्वादर बंदरगाह और ईरान में भारत द्वारा संचालित चाबहार बंदरगाह है। ग्वादर में अपने व्यापार मार्ग और समुद्री कमजोरियों को सुरक्षित करने के लिए चीन बंदरगाह की कड़ी सुरक्षा करता है। पाकिस्तान को चीन से मिले भारी भरकम कर्ज और सीपीईसी गलियारे पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण मिलने के पीछे भी ये बंदरगाह अहम है। ग्वादर चीन-पाकिस्तान सहयोग से प्राप्त पारस्परिक लाभ का प्रतीक है क्योंकि पाकिस्तान के बुनियादी ढांचे, तकनीक क्षेत्र और बाजार को चीनी ऊर्जा संसाधनों और कनेक्टिविटी के अवसरों से लाभ होता है। इसके बावजूद इस परियोजना को पाकिस्तान में लगातार आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है।