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पाकिस्‍तान में क्या फिर होने वाला है सेना का कब्‍जा, सभी मुद्दों पर चारों खाने चित राजनीतिक दल, दिख रहे बेबस


पाकिस्तान भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहा है तो राजनीतिक अस्थिरता भी देश के सामने चुनौती बन रही है। घरेलू और विदेश हर मोर्चे पर फेल साबित हो रहे पाकिस्तान में एक बार फिर से सैन्य शासन की सुगबुगाहट होने लगी है। ये सवाल उठ रहा है कि क्या सेना ही एकमात्र संस्था है, जो देश को संकट से बाहर निकालने में सक्षम है। आर्थिक और विदेश मामलों के जानकार यूसुफ नजर ने फ्राइडे टाइम्स में अपने लेख में उन पहलुओं को उठाया है, जो एक बार फिर पाकिस्तान की सत्ता सेना के हाथों में जाने का इशारा करती हैं। उन्होंने सवाल किया है कि क्या पाकिस्तान में लोकतंत्र के बजाय तानाशाही ही आर्थिक संकट का हल है। इसके लिए उन्होंने ये तर्क भी दिया है दुनिया की 8 फीसदी से भी कम आबादी पूर्ण लोकतंत्र में रहती है, जबकि 40 प्रतिशत सत्तावादी शासन के तहत रहती है। इकॉनमी की हालत इन तानाशाही शासन वाले देशों में बेहतर दिखती है।
पाकिस्तान की बात करते हुए यूसुफ नजर कहते हैं कि हमें ये स्वीकार करना चाहिए कि पाकिस्तान की ज्यादातर समस्याएं अपनी स्थापना के बाद से लोकतंत्र की कमी के चलते हैं। 1947 के बाद केस समय को देखें तो सत्ता प्रतिष्ठान, सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग, देश के कई परस्पर रूप से जुड़े संकटों के लिए जिम्मेदार हैं। इन समस्याओं को सैन्य हस्तक्षेप ने और ज्यादा बढ़ा दिया है। इसके साथ ही इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि देश के नागरिक नेता सभ्य शासन देने में विफल रहे हैं। इसमें पीटीआई, पीएमएलएन और पीपीपी तीनों पार्टियों को शामिल किया जा सकता है। फिलहाल यह उम्मीद करना बेइमानी लगता है कि मौजूदा राजनीतिक वर्ग पाकिस्तान को वर्तमान दलदल से बाहर निकाल सकता है लेकिन देश में सरकार चलाने के लिए कोई तो चाहिए।
पाकिस्तान की व्यवस्था के ऑपरेशन की जरूरत – पाकिस्तान में दशकों से संस्थानों को जिस तरह बर्बाद किया गया है, उसे देखते हुए उनकी मरम्मत के लिए एक ऑपरेशन की आवश्यकता है। अर्थव्यवस्था के लिए तुरंत कदम उठाए जाने की जरूरत है। आर्थिक संकट से ये कहकर नहीं बचा जा सकता है कि इसके लिए स्थिर राजनीतिक व्यवस्था का इंतजार किया जाए। नजर कहते हैं, ‘मैं तानाशाही लाने का सुझाव नहीं दे रहा हूं लेकिन मेरा मानना है कि फिलहाल यह स्वीकार करना बुद्धिमानी होगी कि हमारे पास एक कार्यात्मक लोकतंत्र नहीं है और सैन्य प्रतिष्ठान ही एकमात्र ऐसी शक्ति है जिसके पास पाकिस्तान को अराजकता में बदलने से रोकने की वास्तविक शक्ति है। जब तक हमारे राजनीतिक दल एक कार्यप्रणाली पर काम नहीं करते और संवैधानिक ढांचे के भीतर काम करने के लिए सहमत नहीं होते, देश लोकतांत्रिक शासन की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकता।
सैन्य प्रतिष्ठान को पिछले दरवाजे से राजनीतिक पार्टियों को मदद के बजाय खुलकर सामने आना चाहिए क्योंकि कोई अन्य संस्था वास्तविक रूप से ऐसा नहीं कर सकती है। कुछ लोग इसकी आलोचना कर सकते हैं लेकिन दूसरा विकल्प अराजकता है। सेना को ये भी मानना चाहिए कि उसने गलत नीतिगत विकल्प अपनाए, जिससे फायदे की बजाय नुकसान अधिक हुआ है। जैसे सिपह-ए-सहाबा, तहरीक लबैक पाकिस्तान जैसे संगठनों का समर्थन। सेना को प्रतिष्ठान को तालिबान के विचारों की स्पष्ट निंदा करनी चाहिए और उनके लिए जीरो टॉलरेंस की नीति अपनानी चाहिए।
अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए माहौल बनाने की जरूरत – यूसुफ नजर के मुताबिक, आर्थिक मोर्चे पर एक अनुकूल आर्थिक माहौल बनाने के लिए राजनीतिक स्थिरता और कट्टरपंथ को खत्म करना आवश्यक है। पीटीआई और धार्मिक चरमपंथियों दोनों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए क्योंकि सामान्य राजनीतिक तरीकों का उपयोग करके महत्वाकांक्षी नव-फासीवादियों और उग्रवादियों से निपटना असंभव है। पीटीआई और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच मौजूदा टकराव से पता चलता है कि संघर्ष की लड़ाई कुछ महीनों तक जारी रहेगी और फिर एक पक्ष झुकेगा।
पाकिस्तान को भारत से ये कैसा डर? क्यों बदल रहा अपनी न्यूक्लियर स्ट्रेटेजी? – आज ये एक सच्चाई है कि पाकिस्तान को देश के सामने मौजूद विभिन्न अस्तित्व संबंधी खतरों का सामना करने के लिए दूरदर्शी नेतृत्व की जरूरत है। चाहे लोकतंत्र हो या गैर-लोकतंत्र, देश की संभावनाएं तब तक धूमिल बनी रहेंगी जब तक कि राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मोर्चों पर कोई बड़ा सुधार नहीं हो जाता। यह मानना मूर्खता है कि केवल तथाकथित जनादेश का सम्मान करने से सभी समस्याएं हल हो जाएंगी।