
दिल्ली ब्लास्ट की घटना बताती है कि कैसे एक छोटी सी चूक बड़े खतरे का कारण बन सकती है। 17 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के नौगाम में एक पोस्टर लगाया गया था। इस पोस्टर ने पुलिस का ध्यान खींचा। इसी वजह से अक्टूबर के आखिर में जम्मू-कश्मीर पुलिस की एक टीम फरीदाबाद पहुंची।
10 नवंबर को लाल किले के पास जो आत्मघाती हमला हुआ, उसे रोका जा सकता था। इस हमले की साजिश का एक सिरा 30 अक्टूबर को ही जम्मू-कश्मीर पुलिस के हाथ आ चुका था। फिर यह गलती क्यों हुई? 17 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के नौगाम में एक पोस्टर लगा, जिसकी वजह से अक्टूबर के अंत में राज्य पुलिस की एक टीम फरीदाबाद आई। इस टीम ने 30 अक्टूबर को डॉ. मुजम्मिल को पकड़ा।
कैसी पूछताछ हुई: इसी मुजम्मिल के मॉडयूल के सहयोगी डॉ. उमर ने 10 नवंबर को लाल किले के पास आत्मघाती हमला किया। सवाल है कि इन 10 दिनों में पुलिस डॉ. मुजम्मिल से पूछताछ में इस हमले की योजना के बारे में क्यों पता नहीं कर पाई? पुलिस को पता नहीं था कि डॉ. उमर कहां है, किस कार से निकला है और उसका टारगेट क्या है? उमर जिस गाड़ी से फरार हुआ, क्या उसका नंबर हरियाणा या जम्मू-कश्मीर पुलिस के पास नहीं था? क्या उसके भागने का एक भी CCTV फुटेज उस समय नहीं था?
दिल्ली पुलिस अनजान: अगर, इन दोनों राज्यों की पुलिस ने डॉ. मुजम्मिल की गिरफ्तारी की जानकारी दिल्ली पुलिस को दी होती तो मुमकिन है कि डॉ. उमर किसी चेकपोस्ट पर पकड़ा जाता। मगर ऐसा नहीं हुआ। अलबत्ता, 10 नवंबर की दोपहर हरियाणा पुलिस ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें उसने आतंकी मॉड्यूल से 3000 किलो अमोनियम नाइट्रेट की बरामदगी को बड़ी कामयाबी बताया। उसी शाम उस मॉड्यूल के फरार शख्स डॉ. उमर ने लाल किले के पास धमाका किया। इसमें गलती किसकी है?
Home / Uncategorized / चूक तो हुई है… दिल्ली लालकिला ब्लास्ट मामले में जांच एजेंसियों के लिए हैं कई सबक
IndianZ Xpress NZ's first and only Hindi news website