
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि एफआईआर दर्ज करने के आदेश के लिए न्यायिक मैजिस्ट्रेट को पहले से सरकारी मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि धारा 196 या 197 के तहत मंजूरी सिर्फ उस समय जरूरी होती है, जब अदालत किसी मामले में औपचारिक रूप से संज्ञान लेती है, न कि जांच शुरू करने के शुरुआती चरण में।
यह टिप्पणी CPI(M) नेता बृंदा करात की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। इसमें बीजेपी नेताओं कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर समेत अन्य के खिलाफ 2020 दिल्ली दंगों से पहले कथित भड़काऊ भाषणों को लेकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी।
हेट स्पीच के मामले में अदालत ने क्या कहा? – पहले मैजिस्ट्रेट ने यह कहकर एफआईआर का आदेश देने से मना कर दिया था कि इसके लिए सरकारी मंजूरी जरूरी है। अदालत ने साफ कहा कि यह कहना गलत है कि हेट स्पीच पर कानून में कोई कमी है। कोर्ट ने कहा कि बदलते समय को देखते हुए सरकारें चाहें तो नए कानून या नीतियां बनाने पर विचार कर सकती हैं।
हेट स्पीच पर कानून विधायिका के पाले में – सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ हो गया है कि हेट स्पीच पर कानून बनाने की पहल संसद और विधानसभाओं के स्तर पर ही हो सकती है। कोर्ट ने यह माना कि हेट स्पीच और अफवाह फैलाने जैसे मुद्दे भाईचारे, गरिमा और सवैधानिक व्यवस्था पर सीधा असर डालते हैं लेकिन इनसे निपटने के लिए न्यायपालिका अपनी सीमाओं से बाहर जाकर कानून नहीं बना सकती।
Home / News / हेट स्पीट के मामले में FIR के आदेश पर जज को सरकारी मंजूरी की जरूरत नहीं, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
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