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मन को लगी ठेस मानसिक रोगी बना सकती है, जानें कब-कैसे होता है Grief Disorder, दुख से कैसे उबरें


कई बार किसी व्यक्ति पर दुख का ऐसा पहाड़ टूटता है कि उसके लिए खुद को संभालना मुश्किल हो जाता है। जब व्यक्ति खुद को संभाल नहीं पाता तो ग्रीफ डिसऑर्डर का शिकार हो जाता है। ग्रीफ डिसऑर्डर के रोगी को इलाज के साथ-साथ परिवार के सहयोग की भी जरूरत होती है। परिवार का साथ और प्यार रोगी को जल्दी ठीक होने में मदद करता है।
शरीर की तरह मन भी बीमार होता है, लेकिन ज्यादातर लोग मन की बीमारी पर ध्यान नहीं देते। शरीर का रोग दिख जाता है इसलिए उसका इलाज तुरंत कर लिया जाता है। मन का रोग दिखता नहीं है लेकिन इसका असर व्यक्ति पर बहुत गहरा होता है। ग्रीफ डिसऑर्डर एक ऐसा मानसिक रोग है जो बहुत ज्यादा दुखी होने पर होता है।
जीवन में कई बार ऐसे पल आते हैं जब इंसान को खुद को संभालना मुश्किल हो जाता है। किसी अपने की मृत्यु, प्राकृतिक आपदा में सबकुछ खो देना, बिजनेस में इतना घाटा हो जाना जिसकी भरपाई मुश्किल हो। ऐसी स्थिति में कई लोग ग्रीफ डिसऑर्डर के शिकार हो जाते हैं। ग्रीफ डिसऑर्डर क्या है , इसके लक्षण और उपचार क्या हैं, आइए जानते हैं।
ग्रीफ डिसऑर्डर क्या है? – ग्रीफ डिसऑर्डर को लंबे समय तक रहने वाला शोक भी कहा जाता है। जब हम किसी अपने को खोते हैं, तो दुख होना स्वाभाविक है। हर इंसान इस स्थिति से गुजरता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब यह दुख बहुत लंबे समय तक बना रहता है और धीरे-धीरे व्यक्ति के पूरे जीवन को प्रभावित करने लगता है। ऐसा लगता है जैसे जीवन रुक गया हो और आगे बढ़ने की कोई इच्छा या ताकत नहीं बची हो।
सामान्य दुख समय के साथ हल्का होने लगता है। व्यक्ति धीरे-धीरे अपने काम, रिश्तों और जीवन में वापस लौटने लगता है। लेकिन ग्रीफ डिसऑर्डर में ऐसा नहीं होता। इसमें दुख की तीव्रता वैसी ही बनी रहती है। व्यक्ति बार-बार उसी दर्द, उसी याद और उसी खालीपन में फंसा रहता है।
इस स्थिति में व्यक्ति समझता है कि उसने किसी को खो दिया है, लेकिन दिल इसे मानने के लिए तैयार नहीं होता। यही कारण है कि वह अंदर ही अंदर संघर्ष करता रहता है। उसे लगता है कि शायद सब ठीक हो जाएगा या जो हुआ है वह सच नहीं है। यह भावनात्मक संघर्ष लंबे समय तक चलता रहता है और मन को थका देता है।
ग्रीफ डिसऑर्डर क्यों होता है ? – दुख या शोक कोई मानसिक बीमारी नहीं है। यह एक स्वाभाविक भावनात्मक प्रतिक्रिया है। लेकिन अगर यह लंबे समय तक बना रहता है और व्यक्ति को सामान्य जीवन जीने से रोकता है, तो यह मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। इससे चिंता, डिप्रेशन, नींद की समस्या और अकेलापन बढ़ सकता है। कुछ लोग तनाव से बचने के लिए गलत आदतों की ओर भी जा सकते हैं।
जब दुख को दबाया जाता है या नजरअंदाज किया जाता है, तो यह खत्म नहीं होता। बल्कि यह किसी और रूप में सामने आता है, जैसे चिड़चिड़ापन, गुस्सा, थकान या शरीर में दर्द। दुख को महसूस करना और उसे स्वीकार करना बहुत जरूरी है।
ग्रीफ डिसऑर्डर के 5 चरण – आमतौर पर लोग ग्रीफ डिसऑर्डर के 5 चरण से गुजरते हैं। ये चरण हमेशा एक ही क्रम में नहीं आते। कुछ लोगों में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे पूरी होती है और वे जीवन में आगे बढ़ने लगते हैं। लेकिन कुछ लोग इस प्रक्रिया में अटक जाते हैं। उन्हें लगता है कि वे हमेशा उसी दर्द में फंसे रहेंगे। ग्रीफ डिसऑर्डर के 5 चरण इस तरह समझे जा सकते हैं-
अस्वीकृति- ग्रीफ डिसऑर्डर का पहला चरण है अस्वीकृति। इस चरण में व्यक्ति को यकीन नहीं होता कि जो हुआ है वह सच है। उसे सब कुछ सपने जैसा लगता है। वह खुद को भावनाओं से अलग करने की कोशिश करता है ताकि दर्द कम महसूस हो।
क्रोध- क्रोध ग्रीफ डिसऑर्डर का दूसरा चरण है। जब धीरे-धीरे सच्चाई समझ में आने लगती है, तो गुस्सा पैदा हो सकता है। यह गुस्सा किसी पर भी हो सकता है- खुद पर, दूसरों पर या परिस्थिति पर। लेकिन इस गुस्से के पीछे अक्सर दर्द और असहायता छिपी होती है।
सौदेबाजी- ग्रीफ डिसऑर्डर का तीसरा चरण है सौदेबाजी। इस चरण में व्यक्ति सोचता है- काश, ऐसा न हुआ होता। काश, मैंने कुछ और किया होता। वह बार-बार अपने मन में अलग-अलग स्थितियों की कल्पना करता है और सोचता है कि शायद चीजें बदल सकती थीं।
डिप्रेशन- यह ग्रीफ डिसऑर्डर का चौथा चरण है। इस चरण में दुख पूरी तरह महसूस होता है। व्यक्ति बहुत उदास, अकेला और थका हुआ महसूस करता है। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता और जीवन में रुचि कम हो जाती है।
स्वीकृति- ग्रीफ डिसऑर्डर के पांचवें चरण में व्यक्ति में स्वीकृति का भाव आ जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि दुख खत्म हो गया। इसका मतलब है कि व्यक्ति सच को स्वीकारना सीख गया है। वह समझता है कि जो हुआ है, उसे बदला नहीं जा सकता। धीरे-धीरे वह अपने जीवन को फिर से संभालने लगता है।
ग्रीफ डिसऑर्डर के लक्षण क्या हैं ? लंबे समय तक चलने वाला शोक सिर्फ मन को नहीं, शरीर को भी प्रभावित करता है। ग्रीफ डिसऑर्डर के लक्षण व्यक्ति में इस तरह नजर आते हैं-
व्यक्ति हमेशा थका हुआ महसूस करता है
नींद नहीं आती या ज्यादा नींद आती है
काम में फोकस नहीं कर पाता
लोगों से दूर रहने लगता है
शरीर में दर्द-कमजोरी महसूस होती है
ग्रीफ डिसऑर्डर से बचने के उपाय – दुख से उबरने के लिए सबसे पहले दुख को स्वीकार करना जरूरी है। अपने आप को मजबूत दिखाने की बजाय यह मानना ठीक है कि आप दुखी हैं। दुख को महसूस करना कमजोरी नहीं है, बल्कि यह ठीक होने की शुरुआत है।
दुख की घड़ी में अपनी भावनाओं को व्यक्त करना बहुत मदद करता है। आप किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात कर सकते हैं। अगर बात करना मुश्किल लगे, तो लिख सकते हैं। डायरी लिखना, अपने विचारों को शब्द देना, मन को हल्का करता है।
जब आप दुखी हों उस समय अकेले रहने की बजाय किसी से जुड़ना जरूरी है। यह कोई दोस्त, परिवार का सदस्य या कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो आपको समझता हो। सिर्फ किसी का साथ होना भी दर्द को कम कर सकता है।
कुछ लोग यादों के माध्यम से भी राहत पाते हैं, जैसे प्रिय व्यक्ति की याद में कुछ करना, उनकी तस्वीर देखना या उनके बारे में बात करना। इससे मन को यह महसूस होता है कि वह व्यक्ति पूरी तरह गया नहीं है, बल्कि यादों में मौजूद है।
अगर दुख बहुत ज्यादा हो और संभालना मुश्किल लगे, तो एक्सपर्ट की मदद ली जा सकती है। दुख से उबरने का मतलब यह नहीं है कि आप सब कुछ भूल जाएं। इसका मतलब है कि आप उस हानि के साथ जीना सीखें। धीरे-धीरे जीवन में फिर से खुशी ढूंढना संभव है।
दुख भी प्रेम का ही रूप है – दुख की घड़ी में यह समझना जरूरी है कि शोक प्रेम का ही एक रूप है। जितना गहरा लगाव होता है, उतना ही गहरा दुख होता है। लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि उस लगाव को खत्म कर दिया जाए, बल्कि उसे एक ऐसी याद में बदल दिया जाए जो आपको तोड़ने के बजाय मजबूत बनाए। समय, धैर्य और सही सहारा मिलने पर दुख धीरे-धीरे हल्का हो सकता है। और एक दिन ऐसा आता है, जब वही यादें दर्द के साथ-साथ मुस्कान भी देने लगती हैं।