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सिंदूर खेला, जय मां दुर्गे, कश्मीर में बदलाव की बयार, लाल चौक पर बंगालियों ने निकाली दुर्गापूजा की शोभायात्रा


2019 से पहले श्रीनगर के लाल चौक पर हमेशा कर्फ्यू जैसे हालात होते थे। मगर 2019 में अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद माहौल बदल गया है। स्वतंत्रता दिवस और रिपब्लिक डे में लाल चौक के ऐतिहासिक क्लॉक टावर पर तिरंगा फहराया जाने लगा। अब बंगाली समुदाय के लोगों ने वहां दुर्गापूजा की शोभायात्रा निकाली। दुर्गा विसर्जन के मौके पर पारंपरिक सिंदूर खेला के साथ जय मां दुर्गे के जयकारे भी लगे। लाल चौक पर दुर्गापूजा के रंग देखने को मिले। ‘जय मां दुर्गे’ के जयकारों के बीच उत्सव और उल्लास का माहौल नजर आया।
पारंपरिक वेशभूषा में ढोल की थाप पर किया नृत्य – शोभायात्रा में शामिल पुरुषों और महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में ढोल की थाप पर नृत्य करते हुए मां दुर्गा को विदाई दी। ऐतिहासिक लाल चौक स्थित घंटाघर के पास से निकली इस यात्रा में बंगाली समुदाय के लोगों ने उत्साह के साथ हिस्सा लिया। इस दौरान पूरे इलाके में उत्सव का माहौल देखने को मिला। शोभायात्रा कश्मीर में रहने वाले बंगाली समुदाय की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं को प्रदर्शित कर रही थी। पांच दिनों तक चले दुर्गोत्सव के समापन पर लोगों ने मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन के साथ अगले साल फिर उनके आगमन की कामना की।
लाल चौक से आगे अमीरा कदल घाट पहुंची यात्रा – शोभायात्रा लाल चौक से आगे बढ़ते हुए अमीरा कदल घाट पहुंची। यहां देवी दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन से पहले वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया गया और विधि-विधान से आरती की गई। इसके बाद पारंपरिक विदाई गीतों के बीच प्रतिमा को झेलम नदी में विसर्जित कर दिया गया। शारदीय नवरात्रि और विजयादशमी के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम के साथ बंगाली समुदाय के पांच दिवसीय दुर्गोत्सव का समापन हुआ। धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान लोगों ने मां दुर्गा से सुख-समृद्धि और शांति की कामना की।
अजान के सम्मान में कुछ समय के लिए रोकी गई यात्रा – इस आयोजन के दौरान एक ऐसा दृश्य भी सामने आया जिसने कश्मीर की साझा संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता की परंपरा को दिखाया। अजान के समय उसके सम्मान में शोभायात्रा को कुछ मिनटों के लिए रोक दिया गया। इसके बाद यात्रा आगे बढ़ी और विसर्जन की रस्म पूरी की गई। अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान दिखाने वाली यह घटना आपसी सद्भाव और सह-अस्तित्व का संदेश देती है। कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी ‘कश्मीरियत’ की भावना भी इसी तरह विभिन्न समुदायों के बीच सम्मान और मेलजोल पर जोर देती है।