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लंदन शहर का टूटता तिस्लिम

आलोक गुप्ता

जिस शहर के साम्राज्य का कवि सूर्यस्त नहीं हुआ करता था वह आज एक थका सा, बिखरा हुआ और बदहवास की स्थिति की मन: स्थिति का शहर प्रतीत होता है|

1999 क्रिकेट विश्व कप के  के ठीक 20 वर्ष बाद यहां दोबारा  आकर लगा के अब यह वह शहर नहीं है जिसे आपने दो दशक पहले एक सुव्यवस्थित, सद्भाव और विश्वास से परिपूर्ण शहर के रूप में पाया था|

न्यूजीलैंड से 26 घंटे की लंबी हवाई यात्रा के बाद शुरुआती चंद घंटों में लंदन शहर ने जो अनुभव दिए उससे लगा के इस ऐतिहासिक और दुनिया का सबसे शक्तिशाली शहर होने का तिस्लिम टूटने की कगार पर है|

हर कीमत पर बेचने की मानसिकता

लंदन के  हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरते ही  मैं रेंटल (किराये की ) कार लेने हवाई अड्डे के निकट यूरो कार के दफ्तर में गया| वहां जिस तरह से काउंटर पर महिला ने मुझे डरा कर धमका कर और सहमा कर ज्यादा बड़ी गाड़ी ज्यादा महंगी गाड़ी किराए पर लेने का दबाब बनाया|  उसे ना करने के बाद जिस तरह से उसने मुझे फिर इंश्योरेंस लेने का  प्रैशर बनाया यह कहते हुए की लंदन शहर के लिए इंश्योरेंस अति आवश्यक है कब कहां कौन आपको ठोक जाए इसका कोई भरोसा नहीं है| आपकी खड़ी गाड़ी भी सुरक्षित नहीं है| और अगर आप इंश्योरेंस नहीं लेते हैं तो आपको हर एक स्क्रैच पर भी 1200  ब्रिटिश पाउंड की पेनल्टी देनी पड़ेगी,  तो मुझे लगा के  जब चीजों को किसी भी कीमत पर बेचने की मानसिकता, नैतिकता  से सारे समझौते कर,  यहां भी अपनी जड़ें जमा चुके हैं|  20 वर्ष पूर्व की ग्राहक के प्रति आओभगत वाली मुस्कान और सहजता पूरी तरह नदारद थी| एक देश में उतरते ही आपको इतना असहज और असुरक्षित महसूस करा कर चीजों को बेचने का प्रयास बहुत कष्टदायक अनुभव था

फेक करेंसी और कैशलेस इकोनामी

सुबह का समय था तो मैं अपने बेटे के साथ नाश्ते के लिए विख्यात सेंट्रल लंदन के बर्गर किंग के रेस्टोरेंट में नाश्ते के लिए गया, पेमेंट के लिए मैंने 50 पाउंड का एक नोट काउंटर पर दिया तो पहले तो उसने जिस तरह से मेरी शक्ल को देखा और फिर उस नोट को ट्यूबलाइट की रोशनी के बैकग्राउंड में उसकी फेक न होने की पुष्टि के लिए देखा तो मैं हतप्रभ था|  मुझसे रहा ना गया और मैंने पूछा कि यह क्यों, क्योंकि उसका  मुझे उस तरह देखना ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसने मेरी नैतिकता पर प्रहार किया है| तो  उसका जबाब था कि क्या आप जानते नहीं हैं यहां किस कदर फेक नोट चलन में है|  फेक करेंसी  से ग्रसित  शहर की अर्थव्यवस्था का दूसरा प्रमाण भी ठीक बगल की वोडाफोन की दुकान से भी मिला जब वहां की सेल्स मैन ने साफ कह दिया कि पेमेंट  सेल्फ क्रेडिट कार्ड से लिया जाएगा|  कैश लेना  संभव नहीं है क्योंकि उससे वह ग्राहक का ट्रेक रिकॉर्ड नहीं रख सकते|  पड़ताल पर उसने बताया कि सरकार चाहती है कि सब कुछ कैशलेस हो जाए|  यह  यह नियम ठीक है या नहीं यह विवाद का विषय हो सकता है लेकिन अपनी ही करेंसी पर विश्वास न कर पाना यह देश की नैतिकता और आर्थिक नियंत्रण और उसके संचालन पर एक बढ़ा व दुखद प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है|

 लंदन दबा हुआ थका हुआ टूटा हुआ अनियंत्रित शहर

शहर की इमारत,  सड़कें,  गाड़ियां,  ट्रैफिक व्यवस्था  की हालत,  लोगों का  रोड पर   प्रतिक्रियात्मक  और आक्रोश  से भरा होना  एक अच्छा अनुभव नहीं था|  दो दशकों में आए इस बदलाव को देख भविष्य कई प्रश्न चिन्ह खड़े करता है|  लंदन  पहले एक आभामंडल लिया हुआ शहर प्रतीत होता था जिसमें उसका इतिहास,  उसकी गरिमा को चार चांद लगाए था|  लेकिन लंदन में उतरते ही चंद घंटों के अनुभव में एक तेज किसी विकासशील देश की तरह एक थके हुए, टूटे हुए शहर का अनुभव देता है |

इमारतें और घर रंगहीन और बाहर से गंदे,   गाड़ियां और सड़कें धूल और प्रदूषण से ग्रसित,  ड्राइवर  भयंकर ट्रेफिक दबाव के चलते आक्रोष और लड़ने की मानसिकता भरे हुए|  ऐसा प्रतीत कराते मानो आप लंदन नहीं भारत के ही किसी शहर में है|  इसी  अनुभव के चलते एक बड़े डिपार्टमेंट स्टोर में  गए  और वहां के शौचालय का उपयोग किया तो रोंगटे खड़े हो गए|  ऐसी कहावत है कि अगर आपको किसी देश की सामान्य  कार्यप्रणाली, सामाजिक सुव्यवस्था का आकलन करना हो तो  तो आप वहाँ   कोई ऐसी जगह  जैसे एयरपोर्ट, बस स्टॉप या किसी बड़े स्टोर  या सरकारी दफ्तर के शौचालय में जाएं तो वह आपको उस देश की सामान्य   नागरिक व्यवस्था का आकलन करा देगा|  तो जब मैं  सेंट्रल लंदन के  एक विख्यात और बड़ी स्टोर चैन के शौचालय में गया तो मैं बहुत असहज और दुखी भी था| शौचालय के दरवाजे की सांकल का टूटा होना,  हाथ धोने के लिए पानी ना होना,  और पूरे शौचालय का बेहद बदबूदार होना इस बात की ओर इंगित कर रहा था की अब यह शहर और यह देश सिर्फ कागजों पर ही दुनिया के विकसित देशों में है|

कुछ ही दिनों में इंग्लैंड के कई और शहरों को घूमने के बाद यह भाव और प्रगाढ़ हो गया कि  अनियंत्रित आबादी,  टूटती अर्थ व्यवस्थाएं,  अमान्य इमीग्रेशन,  राजनीतिक स्वार्थ  और नैतिक पतन का प्रभाव सिर्फ लंदन ही नहीं इंग्लैंड ही नहीं पूरी दुनिया को अपनी आगोश में ले चुका है|