Saturday , May 30 2026 7:16 PM
Home / Lifestyle / पीरियड्स में इतनी चॉकलेट क्यों खाती हैं लड़कियां? उनके शरीर में छिपा है ऐसी हर क्रेविंग की कारण

पीरियड्स में इतनी चॉकलेट क्यों खाती हैं लड़कियां? उनके शरीर में छिपा है ऐसी हर क्रेविंग की कारण


पीरियड्स से पहले या इसके दौरान चॉकलेट, नमकीन चिप्स या कार्ब-हैवी कंफर्ट फूड खाने की क्रेविंग होना आम है और अधिकतर महिलाएं व लड़कियां इस बात को जानती हैं। लेकिन उन्हें भी यह नहीं पता कि हर चीज की क्रेविंग होने का एक खास मतलब होता है। स्त्रियों के शरीर की गहराई से जुड़े क्रेविंग साइंस का मतलब रेनबो हॉस्पिटल के रोजवॉल्क की सीनियर कंसल्टेंट-OBGY और इनफर्टिलिटी स्पेशियलिस्ट डॉक्टर वैशाली शर्मा ने समझाया है।
पीरियड्स के दौरान होने वाली क्रेविंग बहुत सामान्य है और इनके पीछे हॉर्मोन, ब्रेन कैमिस्ट्री, न्यूट्रिशन की जरूरतें और भावनात्मक बदलावों का मिला-जुला प्रभाव होता है।
डॉक्टर वैशाली का कहना है कि ये क्रेविंग सामान्य या अनियमित लग सकती हैं, लेकिन असल में शरीर इन संकेतों के द्वारा कुछ महत्वपूर्ण राज बताना चाहता है। इन क्रेविंग के पीछे का मतलब समझकर महिलाएं अपनी फूड चॉइस को बेहतर बनाकर हेल्थ को सपोर्ट कर सकती हैं और पीरियड्स के दौरान बिना किसी गिल्ट के इन फूड्स को एंजॉय कर सकती हैं।
पीरियड्स में क्रेविंग क्यों होती है ? डॉक्टर वैशाली के अनुसार, मेंस्ट्रुअल क्रेविंग को खासतौर से ल्यूटियल फेज में होने वाले हॉर्मोनल उतार-चढ़ाव से जोड़ा जाता है। ल्यूटियल फेज मासिक धर्म का पीरियड्स शुरू होने और ओव्यूलेशन के बीच का वक्त होता है। इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन लेवल में तेजी से बदलाव आता है।
इस हॉर्मोनल बदलाव की वजह से मूड रेगुलेशन और वेल-बीइंग फीलिंग के लिए जिम्मेदार सेरोटोनिन नाम का ब्रेन केमिकल प्रभावित होता है। इस दौरान सेरोटोनिन लेवल में गिरावट आने से शुगर और कार्ब्स से भरपूर फूड्स की क्रेविंग ट्रिगर होती है। क्योंकि, ऐसे फूड्स अस्थाई तौर पर सेरोटोनिन का उत्पादन बढ़ाकर इमोशनल कंफर्ट देते हैं। इसी के साथ शरीर की पौष्टिक जरूरतें बढ़ने से महिलाओं को पीरियड्स शुरू होने से पहले भूख में बढ़ोतरी का सामना भी करना होता है।
1. चॉकलेट की क्रेविंग का कारण – पीरियड्स क्रेविंग में चॉकलेट खाने का मन करना सबसे आम है। इसके पीछे इमोशनल कंफर्ट के अलावा बायोलॉजिकल कारण भी है। डार्क चॉकलेट में मैग्नीशियम होता है, जो मसल्स रिलैक्सेशन, मूड बैलेंस और थकान कम करने के लिए जरूरी होता है। कुछ महिलाओं में पीरियड्स के दौरान मैग्नीशियम लेवल कम हो जाता है, जिससे चॉकलेट की क्रेविंग हो सकती है। साथ ही चॉकलेट खाने से डोपामाइन और सेरोटोनिन रिलीज होते हैं, जो इस वक्त में होने वाले चिड़चिड़ेपन और लो एनर्जी को सुधार सकते हैं।
2. नमकीन स्नैक की क्रेविंग – अचार, चिप्स, फ्राइज या अन्य नमकीन स्नैक की क्रेविंग को हॉर्मोनल बदलाव और फ्लूइड रिटेंशन से जोड़ते हैं। पीरियड्स से पहले प्रोजेस्टेरोन लेवल में बदलाव आने से ब्लोटिंग और फ्लूइड बैलेंस प्रभावित हो सकता है। नमक की क्रेविंग माइल्ड डिहाइड्रेशन या इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन के कारण भी हो सकती है। हालांकि, ज्यादा नमक का सेवन ब्लोटिंग और वॉटर रिटेंशन बढ़ाकर पीरियड्स को असुविधाजनक कर सकता है। महिलाओं को हैवी प्रोसेस्ड साल्टी स्नैक की जगह रोस्टेड नट्स, सीड्स, हल्के सीजन्ड होममेड स्नैक जैसे हेल्दी ऑप्शन से क्रेविंग को शांत करना चाहिए।
3. शुगर और कार्ब्स की क्रेविंग – कई महिलाओं को पीरियड्स शुरू होने से पहले मीठा, पेस्ट्री, पास्ता या ब्रेड खाने की क्रेविंग होती है। इसके पीछे सेरोटोनिन और एनर्जी का बदलाव होता है। रिफाइंड कार्ब्स वाले ऐसे फूड्स ब्लड शुगर में तेजी से बढ़ोतरी करते हैं, जो अस्थाई रूप से मूड को बेहतर बनाकर थकान मिटाते हैं। हालांकि, यह एनर्जी थोड़ी देर के लिए होती है और फिर शुगर क्रैश होता है, जो चिड़चिड़ापन और थकान बढ़ाता है। इन फूड्स की जगह ओट्स, साबुत अनाज, फल, शकरकंद जैसे कॉम्प्लेक्स कार्ब्स फूड खाना ज्यादा हेल्दी है, जिनसे ब्लड शुगर और एनर्जी बनी रहती है।
4. रेड मीट की क्रेविंग – कुछ महिलाओं को पीरियड्स में बर्गर, रेड मीट या आयरन से भरपूर फूड की क्रेविंग होती है, खासतौर से हैवी ब्लीडिंग का अनुभव करने वाली महिलाओं को। क्योंकि, आयरन की कमी से थकान, कमजोरी और लो एनर्जी होती है। आयरन रिच फूड खाने से इस कमी की कुछ हद तक भरपाई हो सकती है। पालक, दाल, फलियां, लीन मीट, खजूर और चुकंदर खाने से आयरन लेवल नेचुरल रूप से बढ़ सकता है।
इमोशनल ईटिंग और शारीरिक जरूरत में अंतर समझें – डॉक्टर ने बताया कि हर तरह की क्रेविंग के पीछे शारीरिक जरूरत नहीं होती और इमोशनल फैक्टर भी जिम्मेदार होते हैं। पीरियड्स में मूड स्विंग, तनाव, एंग्जायटी, चिड़चिड़ापन और थकान भी होती है। इस दौरान कुछ फूड कंफर्ट देने वाले हो सकते हैं। लेकिन इन्हें दबाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इससे कई बार क्रेविंग बढ़ जाती है। सबसे जरूरी चीज बैलेंस है और इसे पाने के लिए खुद को फूड की लत से बचाकर कभी-कभार खाना अच्छा तरीका हो सकता है।
लाइफस्टाइल टिप्स से भी कम कर सकते हैं क्रेविंग – पर्याप्त पानी पीएं – कई बार डिहाइड्रेशन या प्यास का एहसास भूख की तरह लग सकता है या फिर क्रेविंग को गंभीर बना सकता है।
पर्याप्त नींद लें – नींद ना लेने से हंगर हॉर्मोन बिगड़ सकते हैं और हाई शुगर-हाई फैट फूड्स की क्रेविंग बढ़ सकती है।
रेगुलर एक्सरसाइज करें – फिजिकल एक्सरसाइज से मूड रेगुलेट होता है ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है। यह तनाव के कारण होने वाली क्रेविंग कंट्रोल करने में भी मदद करता है।
बैलेंस मील लें – खाना छोड़ने या हाई प्रोसेस्ड फूड खाने से ब्लड शुगर अस्थिर हो सकता है, जिससे क्रेविंग बढ़ जाती है।
डॉक्टर वैशाली शर्मा का कहना है कि कभी-कभार होने वाली क्रेविंग नॉर्मल है। हालांकि, इंटेंस क्रेविंग, बिंज ईटिंग, गंभीर मूड चेंज और पीएमएस या पीएमडीडी जैसी कंडीशन को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। गंभीर थकान, चक्कर आना और हैवी ब्लीडिंग से जूझ रही महिलाओं को स्वास्थ्य के दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।