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अफ्रीका में चीन-तुर्की के प्रभुत्व को ध्वस्त कर सकता है भारत, इजरायली एक्सपर्ट ने क्यों मांगा दिल्ली का साथ?


भारत के फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को इजरायल के बहु-स्तरीय साइबर और फिजिकल सुरक्षा प्रोटोकॉल के साथ एकीकृत करके, बरबेरा जैसे रणनीतिक बंदरगाहों को कमजोर चोकपॉइंट के बजाय संरक्षित, संप्रभु गलियारों में बदल दिया जाता है। इजरायल के एक्सपर्ट ने नई दिल्ली के सामने एक बड़ा प्रस्ताव रखा है। जिसमें कहा गया है कि “हॉर्न ऑफ अफ्रीका में इजरायल और भारत की प्रयोगशाला में बदला जा सकता है।” डॉ. लॉरेन डागन एमोस ने जेरूशलम पोस्ट में एक ओपिनियन लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने ये प्रस्ताव दिया है। डॉ. लॉरेन, बेगिन-सादत सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज (BESA) में फेलो हैं और बार-इलान यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हैं।
उन्होंने लिखा है कि ईरान, हॉर्न ऑफ अफ्रीका में कमजोर और खराब तरीके से शासित क्षेत्रों का इस्तेमाल इजरायल के खिलाफ करना चाहता है। इसीलिए सोमालीलैंड को इजरायल ने मान्यता दी है। इजरायल के इस कदम को क्षेत्रीय समुद्री व्यवस्था के व्यापक “पुनर्गठन” में एक केंद्रीय घटक के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने लिखा है कि सोमालीलैंड एक “अनौपचारिक व्यवस्था की प्रयोगशाला” के रूप में उभरा है, जो समुद्री शासन के एक नए रूप के लिए एक परीक्षण स्थल है। उन्होंने कहा है कि ये देश, चीन और तुर्की जैसे देशों के कर्ज जाल और सैन्य सुविधाओं पर निर्भर हैं, लेकिन इजरयल और भारत, एक वैकल्पिक मॉडल को आगे बढ़ा रहे हैं जो “औपचारिक गठबंधन पर कार्यक्षमता” को प्राथमिकता देता है।