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शबाना आजमी बोलीं- मैं मुस्लिम हूं, लेकिन नमाज नहीं पढ़ती, धर्म एक निजी मामला, सरकार इसमें दखल न दे


शबाना आजमी एक ऐसे माहौल में पली-बढ़ीं, जहां उनके पिता कैफी आजमी एक नास्तिक थे, और उनकी मां शौकत आजमी इस्लाम का पालन तो करती थीं, लेकिन बहुत गंभीरता से नहीं। हाल ही में एक इंटरव्यू में, शबाना से पूछा गया कि बचपन में धर्म के साथ उनका कैसा नाता था और क्या बाद में यह उनके जीवन का हिस्सा बन गया।
IIMUN के यूट्यूब चैनल पर शेयर की गई एक बातचीत में, शबाना आजमी ने बताया, ‘मेरे पिता नास्तिक थे। और मेरी मां इस्लाम का पालन करती थीं, लेकिन बहुत गंभीरता से नहीं।’ उन्होंने आगे बताया कि हालांकि वह अपनी रोजमर्रा की बातचीत में ‘माशाअल्लाह’ और ‘इंशाअल्लाह’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन उनके नास्तिक पति जावेद अख्तर अक्सर इस पर आपत्ति जताते हैं।
शबाना की इन बातों से जावेद को चिढ़ – उन्होंने कहा, ‘जैसे कभी-कभी मैं ‘माशाअल्लाह’ या ‘इंशाअल्लाह’ कह देती हूं, तो जावेद कहते हैं, ‘तुम ऐसा क्यों कहती हो? अगर कोई हर समय ‘प्रभु जी की मर्जी’ कहता रहे, तो तुम्हें कैसा लगेगा?’ लेकिन मुझे लगता है कि ये बस मेरी भाषा का हिस्सा बन गए हैं।’ शबाना ने यह भी कहा कि उन्हें कभी धर्म को लेकर कोई उत्सुकता नहीं रही।
नास्तिक हैं जावेद अख्तर – जावेद को एक कट्टर नास्तिक बताते हुए, शबाना ने कहा, ‘वे एक बहुत कट्टर नास्तिक हैं। मैं उनसे कहती हूं, ‘आपको इसे इतना जाहिर करने की क्या जरूरत है? अगर कोई व्यक्ति धर्म का पालन करके सुकून पा रहा है, तो उसे ऐसा करने दें। उन्हें बुरा क्यों महसूस कराएं?’ इस पर वे कहते हैं कि क्योंकि उनकी बातें मुझे बुरा महसूस कराती हैं। तो क्या एक नास्तिक होने के नाते मुझे भी बुरा महसूस करने का अधिकार नहीं है?’
‘मुस्लिम हूं, लेकिन नमाज नहीं पढ़ती’ – अपने बारे में बात करते हुए शबाना ने कहा, ‘हां, मैं एक मुस्लिम हूं, और मुझे ईद, उर्दू और यहां का खाना-पीना पसंद है, मुझे ये सब अच्छा लगता है। लेकिन हम नमाज नहीं पढ़ते, और धर्म से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।’ शबाना ने कहा कि भले ही वह धर्म का पालन न करती हों, लेकिन उनका मानना ​​है कि धर्म एक निजी मामला है और इसमें सरकार को दखल नहीं देना चाहिए।
ईश्वर की अवधारणा… यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिससे मेरा कोई वास्ता रहा हो, बस इतना मानती हूं कि यह पूरी तरह से एक निजी मामला है। सरकार को इसमें नहीं पड़ना चाहिए। यह एक निजी मामला है और अगर प्रार्थना करने से आपको अच्छा लगता है, तो मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं है। शबाना आजमी
कट्टरपंथी को जावेद और मैं बर्दाश्त नहीं कर सकते- शबाना – इससे पहले, ‘ज़ूम’ के साथ बातचीत में शबाना ने देश में धार्मिक बंटवारे पर बात की और कहा कि दोनों धर्मों के कट्टरपंथियों को उनके विचार पसंद नहीं आते। उन्होंने कहा, ‘असहिष्णु समुदायों के कट्टरपंथी न तो जावेद को बर्दाश्त कर सकते हैं और न ही मुझे। हिंदू कट्टरपंथी और मुस्लिम कट्टरपंथी, दोनों ही हमें बर्दाश्त नहीं कर पाते। इसे देखकर हमें लगता है कि हमारी धर्मनिरपेक्ष पहचान साबित हो जाती है। कभी कोई मौलवी फतवा जारी कर देता है, तो कभी कोई हमें आतंकवादी कह देता है।’
लड़ाई हिंदू और मुस्लिम के बीच नहीं – उन्होंने आगे कहा, ‘हमें यह समझने की जरूरत है कि यह लड़ाई हिंदू और मुस्लिम के बीच नहीं है, बल्कि यह उदारवादी लोगों और असहिष्णु लोगों के बीच की लड़ाई है। उदारवादी हिंदू और मुस्लिम एक तरफ हैं, और असहिष्णु हिंदू और मुस्लिम दूसरी तरफ। इसलिए, जब आप इसे इस नज़रिए से देखते हैं, तो आप लोगों को बांटने के लिए धर्म का इस्तेमाल करने वाले ज़हर को खत्म कर देते हैं।’