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भारत और चीन में Sputnik-V टीके का उत्पादन किया जा सकता है: व्लादिमीर पुतिन


रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने मंगलवार को BRICS देशों से कोरोना वायरस का टीका विकसित करने के लिए संयुक्त प्रयास का आह्वान किया है। उन्होंने सुझाव दिया कि रूस की विकसित COVID-19 के टीके Sputnik-5 का उत्पादन चीन और भारत में किया जा सकता है, जो पांच देशों के समूह के सदस्य हैं।
पुतिन ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए 12वें BRICS शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, ‘हमारा मानना है कि BRICS देशों द्वारा टीकों के विकास और अनुसंधान के लिए केंद्र की स्थापना को गति देना महत्वपूर्ण है, जिसे हम अपने दक्षिण अफ्रीकी दोस्तों की पहल पर करने के लिए सहमत हुए थे।’ इस शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग, ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोलसोनारो और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने भाग लिया। इसकी मेजबानी राष्ट्रपति पुतिन ने की।

अमेरिका की दवा निर्माता कंपनी मॉडर्ना (Moderna) ने ऐलान किया है कि ट्रायल के प्रारंभिक डेटा में उसकी कोरोना वायरस वैक्‍सीन mRNA 94.5 प्रतिशत प्रभावी साबित हुई है। मॉडर्ना के आंकड़ों से यह भी पता चला कि उसकी वैक्‍सीन कोरोना वायरस के गंभीर मामलों को भी बेहद प्रभा‍वी साबित हुई है। यही नहीं इस वैक्‍सीन का असर दुनियाभर की हर नस्‍ल के वॉलंटियर पर काफी प्रभावी रहा है। मॉडर्ना ने करीब 30 हजार वॉलंटियर्स पर क्लीनिकल ट्रायल पूरा करने के बाद इसके 94 फीसदी से ज्यादा प्रभावी होने का ऐलान किया है। मॉडर्ना के सीईओ स्टीफेन बैंसेल ने कहा, तीसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल के अध्ययन से हमें पॉजिटिव नतीजे मिले हैं और हमारी कोविड-19 वैक्सीन कोरोना को रोकने में कारगर साबित हो सकती है। अमेरिका सरकार ने पहले ही मॉडर्ना को 10 करोड़ डोज का ऑर्डर दे रखा है। इस वैक्‍सीन की दो डोज हर व्‍यक्ति को चार हफ्ते के अंतराल पर लेनी होगी।

अमेरिका की एक अन्‍य कंपनी Pfizer और BioNTech ने ऐलान किया है कि उसकी mRNA आधारित कोरोना वायरस वैक्सीन ट्रायल में 90 प्रतिशत असरदार साबित हुई है। इस वैक्‍सीन को बनाने वाली टीम के अरबपति लीड साइंटिस्ट उगूर साहिन का दावा है कि वैक्सीन वायरस पर कड़ा प्रहार करेगी और महामारी को खत्म कर देगी। हालांकि, वैज्ञानिकों और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन तक ने कहा है कि वैक्सीन को रामबाण इलाज नहीं माना चाहिए क्योंकि अभी तक इसके काम करने की गारंटी नहीं मिली है। उधर, साहिन का कहना है कि वैक्सीन का पूरा डेटा तीन हफ्ते में आ सकता है। उन्होंने कहा कि यह कोविड-19 को रोक सकेगी लेकिन क्या यह ट्रांसमिशन को रोक सकेगी या नहीं, इसका जवाब अभी नहीं मिला है। साहिन ने कहा कि वैक्सीन एक साल के लिए सुरक्षा देगी और हर साल एक बूस्टर की जरूरत पड़ सकती है।

उधर, दुनिया की सबसे पहली कोरोना वायरस वैक्‍सीन बनाने का ऐलान करने वाले रूस ने कहा है कि उसकी कोविड-19 वैक्‍सीन अंतरिम आंकड़ों में 92 फीसदी तक प्रभावी साबित हुई है। रूस ने यह ऐलान अमेरिकी कंपनी फाइजर के ऐलान के दो दिन बाद किया था। रूसी कोरोना वैक्सीन Sputnik V की पहली खेप भारत भी आ गई है। हाल ही में फार्मा कंपनी डॉ. रेड्डीज को रूसी कोरोना वैक्सीन के भारत में ह्यूमन ट्रायल की अनुमति मिली थी। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने फार्मा कंपनी डॉ रेड्डी लैबोरेटरीज को रूसी वैक्‍सीन के ट्रायल की इजाजत दी है। वैक्‍सीन का 1,400 लोगों पर फेज 3 ट्रायल किया जाएगा। यह वैक्‍सीन मॉस्‍को के गामलेया रिसर्च इंस्टिट्यूट ने बनाई है। रशियन डायरेक्‍ट इनवेस्‍टमेंट फंड (RDIF) ने वैक्‍सीन की रिसर्च और प्रॉडक्‍शन को पैसा दिया है। फेज 2 ट्रायल में यह वैक्‍सीन 21 दिन के भीतर इम्‍युनिटी डिवेलप करने में कामयाब रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, वैक्‍सीन का दूसरा इंजेक्‍शन दिए जाने पर इम्‍युनिटी डबल हो गई।

कोरोना के खिलाफ 90 से ज्‍यादा फीसदी की सुरक्षा देने वाली ये कोविड-19 वैक्‍सीन बनने के बाद अब सवाल उठ रहा है कि भारत के लिए कौन सी वैक्‍सीन सबसे अच्‍छी साबित हो सकती है। सबसे पहले बात फाइजर की कोरोना वैक्‍सीन की। अमेरिकी कंपनी फाइजर की कोरोना वायरस वैक्‍सीन 90 फीसदी सुरक्षा देने में प्रभावी साबित हुई है लेकिन इसकी एक बड़ी कमी है। फाइजर की कोरोना वायरस वैक्‍सीन बहुत ही ज्‍यादा ठंडे तापमान (माइनस 70 डिग्री) पर रखना होगा जिसकी सुविधा भारत जैसे विकासशील और गरीब देशों में बहुत कम है। इस वैक्‍सीन को भारत जैसे देश में एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाना ही सबसे बड़ी चुनौती होगा।

इसके विपरीत मॉडर्ना की कोरोना वायरस वैक्‍सीन को मात्र माइनस 20 डिग्री तापमान पर घर के फ्रीजर में 6 महीने तक बिना खराब हुए रखा जा सकता है। इससे भारत समेत अन्‍य विकासशील देशों में आसानी से मॉडर्ना की वैक्‍सीन को स्‍टोर करके रखा जा सकेगा। यही नहीं इस वैक्‍सीन को भी वर्तमान कोल्‍ड चेन की सुविधाओं को इस्‍तेमाल करके एक जगह से दूसरी जगह तक भेजा जा सकता है। मॉडर्ना ने यह भी कहा है कि उसकी निर्यात की जाने वाली कोरोना वैक्‍सीन को 30 दिनों तक सामान्‍य फ्रीज के अंदर 2 से 8 डिग्री तापमान पर 30 दिनों तक रखा जा सकता है। इसके 10 डोज के वाइल को कमरे के अंदर भी 12 घंटे तक रखा जा सकता है।

रूस की कोरोना वैक्‍सीन का भारत समेत दुनिया के कई देशों में ट्रायल चल रहा है लेकिन उसकी प्रभावी क्षमता और साइड इफेक्‍ट्स को लेकर वैज्ञानिक सवाल उठा रहे हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों और एक्सपर्ट्स ने कहा है कि रूस ने अभी ट्रायल के अलावा बड़ी आबादी को कोरोना वैक्सीन नहीं दी है। यहां तक कि बड़े-बड़े इलाकों में बेहद कम खुराकें भेजी जा रही हैं। वैक्सिनेशन कैंपेन के धीमे होने की वजह को अभी समझा नहीं जा सका है। इसके पीछे सीमित उत्पादन क्षमता भी हो सकती है। हाल ही में 20 लाख लोगों वाले क्षेत्र में सिर्फ 20 लोगों के लिए खुराकों का शिपमेंट भेजा गया। रूस के स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह नहीं बताया है कि कितने लोगों को रूस में वैक्सिनेट किया गया है। वहीं, असोसिएशन ऑफ क्लिनिकल ट्रायल ऑर्गनाइजेशन की डायरेक्टर स्वेतलाना जाविडोवा का कहना है कि अगर इस वैक्सीन का उत्पादन सीमित हो तो यह अच्छी बात है क्योंकि इसे जल्दीबाजी में अप्रूवल दिया गया था। सितंबर में Lancet में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक यह वैक्सीन सुरक्षित है। फेज 1 और फेज 2 के आंकड़ों के मुताबिक इसने सेल्युलर और एंटीबॉडी रिस्पांस जेनरेट किया।

‘Sputnik News’ के मुताबिक, पुतिन ने कहा कि रूस का Sputnik-5 टीका जो अगस्त में पंजीकृत किया गया था, उसका उत्पादन BRICS के दो सदस्य देशों चीन और भारत में किया जा सकता है। पुतिन ने कहा, ‘रूसी प्रत्यक्ष निवेश कोष ने Sputnik-5 वैक्सीन के नैदानिक परीक्षणों के संचालन को लेकर अपने ब्राज़ीली और भारतीय साझेदारों के साथ समझौते किए हैं। इसने चीन और भारत में दवा कंपनियों के साथ एक समझौता भी किया है ताकि इन देशों में टीके का उत्पादन शुरू किया जा सके, जिससे न केवल उनकी जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि वे अन्य देशों की भी मदद कर सकेंगे।’

गौरतलब है कि 11 अगस्त को रूस कोरोना वायरस के टीके को पंजीकृत कराने वाला दुनिया का पहला देश बन गया, जिसका नाम Sputnik-5 है। गामालेया रिसर्च इंस्टिट्यूट ने इस टीके को विकसित किया है, जबकि रूसी प्रत्यक्ष निवेश कोष (आरडीआईएफ) विदेशों में इस टीके के उत्पादन और संवर्धन में निवेश कर रहा है। वेक्टर रिसर्च सेंटर द्वारा निर्मित एक अन्य रूसी टीका एपिकोरोनावैक अक्टूबर में पंजीकृत किया गया था।

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